Couplets Poetry (page 535)
हम रोज़-ए-विदाअ' उन से हँस हँस के हुए रुख़्सत
अल्ताफ़ हुसैन हाली
हम जिस पे मर रहे हैं वो है बात ही कुछ और
अल्ताफ़ हुसैन हाली
होती नहीं क़ुबूल दुआ तर्क-ए-इश्क़ की
अल्ताफ़ हुसैन हाली
हर सम्त गर्द-ए-नाक़ा-ए-लैला बुलंद है
अल्ताफ़ हुसैन हाली
है जुस्तुजू कि ख़ूब से है ख़ूब-तर कहाँ
अल्ताफ़ हुसैन हाली
'हाली' सुख़न में 'शेफ़्ता' से मुस्तफ़ीद है
अल्ताफ़ हुसैन हाली
गुल-ओ-गुलचीं का गिला बुलबुल-ए-ख़ुश-लहजा न कर
अल्ताफ़ हुसैन हाली
फ़रिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना
अल्ताफ़ हुसैन हाली
फ़राग़त से दुनिया में हर दम न बैठो
अल्ताफ़ हुसैन हाली
इक दर्द हो बस आठ पहर दिल में कि जिस को
अल्ताफ़ हुसैन हाली
दिल से ख़याल-ए-दोस्त भुलाया न जाएगा
अल्ताफ़ हुसैन हाली
दिखाना पड़ेगा मुझे ज़ख़्म-ए-दिल
अल्ताफ़ हुसैन हाली
धूम थी अपनी पारसाई की
अल्ताफ़ हुसैन हाली
दरिया को अपनी मौज की तुग़्यानियों से काम
अल्ताफ़ हुसैन हाली
चोर है दिल में कुछ न कुछ यारो
अल्ताफ़ हुसैन हाली
बे-क़रारी थी सब उम्मीद-ए-मुलाक़ात के साथ
अल्ताफ़ हुसैन हाली
बहुत जी ख़ुश हुआ 'हाली' से मिल कर
अल्ताफ़ हुसैन हाली
आगे बढ़े न क़िस्सा-ए-इश्क़-ए-बुताँ से हम
अल्ताफ़ हुसैन हाली
आ रही है चाह-ए-यूसुफ़ से सदा
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ये क्या कि फ़क़त अपनी ही तस्वीर बनाओ
अलक़मा शिबली
उस मंज़िल-ए-हयात में अब गामज़न है दिल
अलक़मा शिबली
क्यूँ लग़्ज़िश-ए-पा मेरी मलामत का हदफ़ है
अलक़मा शिबली
गुम रहोगे कब तक अपनी ज़ात ही में
अलक़मा शिबली
यूँ निभाता हूँ मैं रिश्ते 'आलोक'
आलोक यादव
वाइ'ज़ सफ़र तो मेरा भी था रूह की तरफ़
आलोक यादव
सुन रहा हूँ कि वो आएँगे हँसाने मुझ को
आलोक यादव
प्यार का दोनों पे आख़िर जुर्म साबित हो गया
आलोक यादव
नई नस्लों के हाथों में भी ताबिंदा रहेगा
आलोक यादव
मुझ को जन्नत के नज़ारे भी नहीं जचते हैं
आलोक यादव
मिरे लिए हैं मुसीबत ये आइना-ख़ाने
आलोक यादव