Sad Poetry (page 286)
ज़रा सी देर थी बस इक दिया जलाना था
अख्तर शुमार
या तो सूरज झूट है या फिर ये साया झूट है
अख्तर शुमार
उस के नज़दीक ग़म-ए-तर्क-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं
अख्तर शुमार
तिरे बग़ैर मसाफ़त का ग़म कहाँ कम है
अख्तर शुमार
सितारा ले गया है मेरा आसमान से कौन
अख्तर शुमार
सारी ख़िल्क़त एक तरफ़ थी और दिवाना एक तरफ़
अख्तर शुमार
ख़्वाहिश-ए-जादा-ए-राहत से निकलता कैसे
अख्तर शुमार
हिसार-ए-क़र्या-ए-खूँबार से निकलते हुए
अख्तर शुमार
अभी दिल में गूँजती आहटें मिरे साथ हैं
अख्तर शुमार
ज़िंदगी कितनी मसर्रत से गुज़रती या रब
अख़्तर शीरानी
याद आओ मुझे लिल्लाह न तुम याद करो
अख़्तर शीरानी
वो अगर आ न सके मौत ही आई होती
अख़्तर शीरानी
उम्र भर की तल्ख़ बेदारी का सामाँ हो गईं
अख़्तर शीरानी
थक गए हम करते करते इंतिज़ार
अख़्तर शीरानी
मुद्दतें हो गईं बिछड़े हुए तुम से लेकिन
अख़्तर शीरानी
कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता
अख़्तर शीरानी
कुछ इस तरह से याद आते रहे हो
अख़्तर शीरानी
ख़फ़ा हैं फिर भी आ कर छेड़ जाते हैं तसव्वुर में
अख़्तर शीरानी
इन्ही ग़म की घटाओं से ख़ुशी का चाँद निकलेगा
अख़्तर शीरानी
ग़म-ए-ज़माना ने मजबूर कर दिया वर्ना
अख़्तर शीरानी
ग़म-ए-आक़िबत है न फ़िक्र-ए-ज़माना
अख़्तर शीरानी
ग़म अज़ीज़ों का हसीनों की जुदाई देखी
अख़्तर शीरानी
दिल में लेता है चुटकियाँ कोई
अख़्तर शीरानी
चमन में रहने वालों से तो हम सहरा-नशीं अच्छे
अख़्तर शीरानी
भुला बैठे हो हम को आज लेकिन ये समझ लेना
अख़्तर शीरानी
अब वो बातें न वो रातें न मुलाक़ातें हैं
अख़्तर शीरानी
अब जी में है कि उन को भुला कर ही देख लें
अख़्तर शीरानी
आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या
अख़्तर शीरानी
वक़्त की क़द्र
अख़्तर शीरानी
ओ देस से आने वाले बता
अख़्तर शीरानी