Couplets Poetry (page 18)
है लुत्फ़ तग़ाफ़ुल में या जी के जलाने में
ज़हीर देहलवी
है दिल में अगर उस से मोहब्बत का इरादा
ज़हीर देहलवी
गुदगुदाया जो उन्हें नाम किसी का ले कर
ज़हीर देहलवी
दर्द और दर्द भी जुदाई का
ज़हीर देहलवी
चौंक पड़ता हूँ ख़ुशी से जो वो आ जाते हैं
ज़हीर देहलवी
चाहत का जब मज़ा है कि वो भी हों बे-क़रार
ज़हीर देहलवी
बुझाऊँ क्या चराग़-ए-सुब्ह-गाही
ज़हीर देहलवी
बज़्म-ए-दुश्मन में जा के देख लिया
ज़हीर देहलवी
ब'अद मरने के भी मिट्टी मिरी बर्बाद रही
ज़हीर देहलवी
ऐ शैख़ अपने अपने अक़ीदे का फ़र्क़ है
ज़हीर देहलवी
आख़िर मिले हैं हाथ किसी काम के लिए
ज़हीर देहलवी
आज तक कोई न अरमान हमारा निकला
ज़हीर देहलवी
आज आए थे घड़ी भर को 'ज़हीर'-ए-नाकाम
ज़हीर देहलवी
वो चाँदनी वो तबस्सुम वो प्यार की बातें
ज़हीर अहमद ज़हीर
सैंकड़ों दिलकश बहारें थीं हमारी मुंतज़िर
ज़हीर अहमद ज़हीर
आँसू फ़लक की आँख से टपके तमाम रात
ज़हीर अहमद ज़हीर
इक शजर ऐसा मोहब्बत का लगाया जाए
ज़फर ज़ैदी
सो रहे थे शहर भी जंगल भी जब
ज़फ़र ताबिश
सिर्फ़ ज़फ़र 'ताबिश' हैं हम
ज़फ़र ताबिश
न कहो तुम भी कुछ न हम बोलें
ज़फ़र ताबिश
मंज़र से ला-मंज़र तक
ज़फ़र ताबिश
क्या जाने क्यूँ जलती है
ज़फ़र ताबिश
जब भी झुक कर मिलता हूँ मैं लोगों से
ज़फ़र ताबिश
ब-ज़ाहिर यूँ तो मैं सिमटा हुआ हूँ
ज़फ़र ताबिश
बस्ती बस्ती जंगल जंगल घूमा मैं
ज़फ़र ताबिश
याद में तेरी दो-आलम को भुलाना है हमें
ज़फ़र ताबाँ
ताइर-ए-ख़स्ता-बाल को दाम भी कुंज-ए-आशियाँ
ज़फ़र ताबाँ
ख़ूबी ओ शान-ए-दिलबरी ग़म्ज़ा-ओ-नाज़ ही नहीं
ज़फ़र ताबाँ
ख़लिश-ए-इश्क़ से बचपन है दिल एक तरफ़
ज़फ़र ताबाँ
कहते हैं इश्क़ का अंजाम बुरा होता है
ज़फ़र ताबाँ