Couplets Poetry (page 20)
ये ज़िंदगी की आख़िरी शब ही न हो कहीं
ज़फ़र इक़बाल
ये शहर ज़िंदा है लेकिन हर एक लफ़्ज़ की लाश
ज़फ़र इक़बाल
ये साफ़ लगता है जैसी कि उस की आँखें थीं
ज़फ़र इक़बाल
ये क्या फ़ुसूँ है कि सुब्ह-ए-गुरेज़ का पहलू
ज़फ़र इक़बाल
ये हम जो पेट से ही सोचते हैं शाम ओ सहर
ज़फ़र इक़बाल
ये हाल है तो बदन को बचाइए कब तक
ज़फ़र इक़बाल
ये भी मुमकिन है कि इस कार-गह-ए-दिल में 'ज़फ़र'
ज़फ़र इक़बाल
यहीं तक लाई है ये ज़िंदगी भर की मसाफ़त
ज़फ़र इक़बाल
यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिला
ज़फ़र इक़बाल
वो सूरत देख ली हम ने तो फिर कुछ भी न देखा
ज़फ़र इक़बाल
वो क़हर था कि रात का पत्थर पिघल पड़ा
ज़फ़र इक़बाल
वो मुझ से अपना पता पूछने को आ निकले
ज़फ़र इक़बाल
वो मक़ामात-ए-मुक़द्दस वो तिरे गुम्बद ओ क़ौस
ज़फ़र इक़बाल
वो चेहरा हाथ में ले कर किताब की सूरत
ज़फ़र इक़बाल
वो बहुत चालाक है लेकिन अगर हिम्मत करें
ज़फ़र इक़बाल
विदाअ' करती है रोज़ाना ज़िंदगी मुझ को
ज़फ़र इक़बाल
वक़्त ज़ाए न करो हम नहीं ऐसे वैसे
ज़फ़र इक़बाल
वहाँ मक़ाम तो रोने का था मगर ऐ दोस्त
ज़फ़र इक़बाल
उठा सकते नहीं जब चूम कर ही छोड़ना अच्छा
ज़फ़र इक़बाल
उस को भी याद करने की फ़ुर्सत न थी मुझे
ज़फ़र इक़बाल
उस को आना था कि वो मुझ को बुलाता था कहीं
ज़फ़र इक़बाल
तुम ही बतलाओ कि उस की क़द्र क्या होगी तुम्हें
ज़फ़र इक़बाल
तुम अपनी मस्ती में आन टकराए मुझ से यक-दम
ज़फ़र इक़बाल
तुझ को मेरी न मुझे तेरी ख़बर जाएगी
ज़फ़र इक़बाल
तिरा चढ़ा हुआ दरिया समझ में आता है
ज़फ़र इक़बाल
तन्हा रहने में भी कोई उज़्र नहीं है
ज़फ़र इक़बाल
टकटकी बाँध के मैं देख रहा हूँ जिस को
ज़फ़र इक़बाल
सुनोगे लफ़्ज़ में भी फड़फड़ाहट
ज़फ़र इक़बाल
सुना है वो मिरे बारे में सोचता है बहुत
ज़फ़र इक़बाल
शब-ए-विसाल तिरे दिल के साथ लग कर भी
ज़फ़र इक़बाल