Couplets Poetry (page 22)
मैं डूबता जज़ीरा था मौजों की मार पर
ज़फ़र इक़बाल
मैं बिखर जाऊँगा ज़ंजीर की कड़ियों की तरह
ज़फ़र इक़बाल
मैं भी कुछ देर से बैठा हूँ निशाने पे 'ज़फ़र'
ज़फ़र इक़बाल
मैं अंदर से कहीं तब्दील होना चाहता था
ज़फ़र इक़बाल
लम्बी तान के सो जा और
ज़फ़र इक़बाल
लगता है इतना वक़्त मिरे डूबने में क्यूँ
ज़फ़र इक़बाल
लगी थी जान की बाज़ी बिसात उलट डाली
ज़फ़र इक़बाल
लगाता फिर रहा हूँ आशिक़ों पर कुफ़्र के फ़तवे
ज़फ़र इक़बाल
क्या ख़बर जिस का यहाँ इतना उड़ाते हैं मज़ाक़
ज़फ़र इक़बाल
कुफ़्र से ये जो मुनव्वर मिरी पेशानी है
ज़फ़र इक़बाल
कोई इस बात को तस्लीम करे या न करे
ज़फ़र इक़बाल
किस ताज़ा मारके पे गया आज फिर 'ज़फ़र'
ज़फ़र इक़बाल
किरदार उस को ढूँडते फिरते हैं जा-ब-जा
ज़फ़र इक़बाल
ख़ुशी मिली तो ये आलम था बद-हवासी का
ज़फ़र इक़बाल
खुल के रो भी सकूँ और हँस भी सकूँ जी भर के
ज़फ़र इक़बाल
ख़ुदा को मान कि तुझ लब के चूमने के सिवा
ज़फ़र इक़बाल
खींच लाई है यहाँ लज़्ज़त-ए-आज़ार मुझे
ज़फ़र इक़बाल
ख़राबी हो रही है तो फ़क़त मुझ में ही सारी
ज़फ़र इक़बाल
ख़ामुशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए
ज़फ़र इक़बाल
ख़ैरात का मुझे कोई लालच नहीं 'ज़फ़र'
ज़फ़र इक़बाल
करता हूँ नींद में ही सफ़र सारे शहर का
ज़फ़र इक़बाल
कैसा है कौन ये तो नज़र आ सके कहीं
ज़फ़र इक़बाल
कैफ़ियत ही कोई पानी ने बदल ली हो कहीं
ज़फ़र इक़बाल
कहाँ तक हो सका कार-ए-मोहब्बत क्या बताएँ
ज़फ़र इक़बाल
कहाँ चली गईं कर के ये तोड़-फोड़ 'ज़फ़र'
ज़फ़र इक़बाल
कब वो ज़ाहिर होगा और हैरान कर देगा मुझे
ज़फ़र इक़बाल
जो यहाँ ख़ुद ही लगा रक्खी है चारों जानिब
ज़फ़र इक़बाल
जिसे दरवाज़ा कहते थे वही दीवार निकली
ज़फ़र इक़बाल
जिसे अब तक तलाश करता हूँ
ज़फ़र इक़बाल
जिस का इंकार हथेली पे लिए फिरता हूँ
ज़फ़र इक़बाल