Couplets Poetry (page 21)

साल-हा-साल से ख़ामोश थे गहरे पानी

ज़फ़र इक़बाल

साफ़-ओ-शफ़्फ़ाफ़ थी पानी की तरह निय्यत-ए-दिल

ज़फ़र इक़बाल

सफ़र पीछे की जानिब है क़दम आगे है मेरा

ज़फ़र इक़बाल

सच है कि हम से बात भी करना नमाज़ है

ज़फ़र इक़बाल

रूह फूँकेगा मोहब्बत की मिरे पैकर में वो

ज़फ़र इक़बाल

रू-ब-रू कर के कभी अपने महकते सुर्ख़ होंट

ज़फ़र इक़बाल

रोक रखना था अभी और ये आवाज़ का रस

ज़फ़र इक़बाल

रौ में आए तो वो ख़ुद गर्मी-ए-बाज़ार हुए

ज़फ़र इक़बाल

रखता हूँ अपना आप बहुत खींच-तान कर

ज़फ़र इक़बाल

रहता नहीं हूँ बोझ किसी पर ज़ियादा देर

ज़फ़र इक़बाल

पूरी आवाज़ से इक रोज़ पुकारूँ तुझ को

ज़फ़र इक़बाल

फिर सर-ए-सुब्ह किसी दर्द के दर वा करने

ज़फ़र इक़बाल

फिर जा रुकेगी बुझते ख़राबों के देस में

ज़फ़र इक़बाल

पतंग उड़ाने से क्या मनअ कर सके ज़ाहिद

ज़फ़र इक़बाल

परियों ऐसा रूप है जिस का लड़कों ऐसा नाँव

ज़फ़र इक़बाल

पलट पड़ा जो मैं सर फोड़ कर मोहब्बत में

ज़फ़र इक़बाल

न जाने क्यूँ मिरी निय्यत बदल गई यक-दम

ज़फ़र इक़बाल

मुस्कुराते हुए मिलता हूँ किसी से जो 'ज़फ़र'

ज़फ़र इक़बाल

मुश्किल-पसंद ही सही मैं वस्ल में मगर

ज़फ़र इक़बाल

मुझ से छुड़वाए मिरे सारे उसूल उस ने 'ज़फ़र'

ज़फ़र इक़बाल

मुझे कुछ भी नहीं मालूम और अंदर ही अंदर

ज़फ़र इक़बाल

मुझे ख़राब किया उस ने हाँ किया होगा

ज़फ़र इक़बाल

मुझ में हैं गहरी उदासी के जरासीम इस क़दर

ज़फ़र इक़बाल

मिला तो मंज़िल-ए-जाँ में उतारने न दिया

ज़फ़र इक़बाल

मेरी सूरज से मुलाक़ात भी हो सकती है

ज़फ़र इक़बाल

मिरी फ़ज़ा में है तरतीब-ए-काएनात कुछ और

ज़फ़र इक़बाल

मिरा मेयार मेरी भी समझ में कुछ नहीं आता

ज़फ़र इक़बाल

मौत के साथ हुई है मिरी शादी सो 'ज़फ़र'

ज़फ़र इक़बाल

मैं ज़ियादा हूँ बहुत उस के लिए अब तक भी

ज़फ़र इक़बाल

मैं किसी और ज़माने के लिए हूँ शायद

ज़फ़र इक़बाल