Couplets Poetry (page 19)
कहते हैं इश्क़ का अंजाम बुरा होता है
ज़फ़र ताबाँ
अब भी ख़ुदा-परस्त है दैर-ओ-हरम की क़ैद में
ज़फ़र ताबाँ
ये किस ने आँख को नंगा किया है दरिया में
ज़फ़र सिद्दीक़ी
ये अमल रेत को पानी नहीं बनने देता
ज़फ़र सहबाई
शिकायतों की अदा भी बड़ी निराली है
ज़फ़र सहबाई
जो पढ़ा है उसे जीना ही नहीं है मुमकिन
ज़फ़र सहबाई
झूट भी सच की तरह बोलना आता है उसे
ज़फ़र सहबाई
जब अधूरे चाँद की परछाईं पानी पर पड़ी
ज़फ़र सहबाई
दिलों के बीच न दीवार है न सरहद है
ज़फ़र सहबाई
यूँही किसी की कोई बंदगी नहीं करता
ज़फ़र मुरादाबादी
तमाम फूल महकने लगे हैं खिल खिल कर
ज़फ़र मुरादाबादी
तमाम फूल महकने लगे हैं खिल खिल कर
ज़फ़र मुरादाबादी
मिरी उम्मीद का सूरज कि तेरी आस का चाँद
ज़फ़र मुरादाबादी
क्या ख़बर किस मोड़ पर बिखरे मता-ए-एहतियात
ज़फ़र मुरादाबादी
ख़ुश-गुमाँ हर आसरा बे-आसरा साबित हुआ
ज़फ़र मुरादाबादी
कारवाँ से जो भी बिछड़ा गर्द-ए-सहरा हो गया
ज़फ़र मुरादाबादी
बढ़े कुछ और किसी इल्तिजा से कम न हुए
ज़फ़र मुरादाबादी
किताब-ए-ज़िंदगी की ये मुक़द्दस आयतें हैं
ज़फ़र ख़ान नियाज़ी
बस इक तुम ही नहीं मंज़र में वर्ना क्या नहीं है
ज़फ़र ख़ान नियाज़ी
वही सुलूक ज़माने ने मेरे साथ किया
ज़फ़र कमाली
शौहरों से बीबियाँ लड़ती हैं छापा-मार जंग
ज़फ़र कमाली
निगाहों में जो मंज़र हो वही सब कुछ नहीं होता
ज़फ़र कमाली
मोहब्बत की जिस को ख़ुमारी लगे
ज़फ़र कमाली
इश्क़ जब से हो गया इक लखनवी ख़ातून से
ज़फ़र कमाली
इस ज़माने की अजब तिश्ना-लबी है ऐ 'ज़फ़र'
ज़फ़र कमाली
वाए ख़ुश-फ़हमी कि पर्वाज़-ए-यक़ीं से भी गए
ज़फ़र कलीम
मोम के लोग कड़ी धूप में आ बैठे हैं
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
ज़िंदा रखता था मुझे शक्ल दिखा कर अपनी
ज़फ़र इक़बाल
'ज़फ़र' ज़मीं-ज़ाद थे ज़मीं से ही काम रक्खा
ज़फ़र इक़बाल
यूँ भी होता है कि यक दम कोई अच्छा लग जाए
ज़फ़र इक़बाल