Couplets Poetry (page 17)
बढ़ गए हैं इस क़दर क़ल्ब ओ नज़र के फ़ासले
ज़हीर काश्मीरी
बड़े दिल-कश हैं दुनिया के ख़म ओ पेच
ज़हीर काश्मीरी
आह ये महकी हुई शामें ये लोगों के हुजूम
ज़हीर काश्मीरी
उतरे तो कई बार सहीफ़े मिरे घर में
ज़हीर ग़ाज़ीपुरी
ता-उम्र अपनी फ़िक्र ओ रियाज़त के बावजूद
ज़हीर ग़ाज़ीपुरी
रेज़ा रेज़ा अपना पैकर इक नई तरतीब में
ज़हीर ग़ाज़ीपुरी
काग़ज़ की नाव भी है खिलौने भी हैं बहुत
ज़हीर ग़ाज़ीपुरी
बम फटे लोग मरे ख़ून बहा शहर लुटे
ज़हीर ग़ाज़ीपुरी
'ज़हीर'-ए-ख़स्ता-जाँ सच है मोहब्बत कुछ बुरी शय है
ज़हीर देहलवी
यूँ तो होते हैं मोहब्बत में जुनूँ के आसार
ज़हीर देहलवी
यहाँ देखूँ वहाँ देखूँ इसे देखूँ उसे देखूँ
ज़हीर देहलवी
वो जितने दूर खिंचते हैं तअल्लुक़ और बढ़ता है
ज़हीर देहलवी
तुम ने पहलू में मिरे बैठ के आफ़त ढाई
ज़हीर देहलवी
शिरकत गुनाह में भी रहे कुछ सवाब की
ज़हीर देहलवी
सर पे एहसान रहा बे-सर-ओ-सामानी का
ज़हीर देहलवी
समझेंगे न अग़्यार को अग़्यार कहाँ तक
ज़हीर देहलवी
सब कुछ मिला हमें जो तिरे नक़्श-ए-पा मिले
ज़हीर देहलवी
क़हर है ज़हर है अग़्यार को लाना शब-ए-वस्ल
ज़हीर देहलवी
मुँह छुपाना पड़े न दुश्मन से
ज़हीर देहलवी
लुत्फ़ जब आए शिकवा-संजी का
ज़हीर देहलवी
कोई पूछे तो सही हम से हमारी रूदाद
ज़हीर देहलवी
किस मुँह से हाथ उठाएँ फ़लक की तरफ़ 'ज़हीर'
ज़हीर देहलवी
किस की आशुफ़्ता-मिज़ाजी का ख़याल आया है
ज़हीर देहलवी
ख़ैर से रहता है रौशन नाम-ए-नेक
ज़हीर देहलवी
कभी बोलना वो ख़फ़ा ख़फ़ा कभी बैठना वो जुदा जुदा
ज़हीर देहलवी
इश्क़ क्या शय है हुस्न है क्या चीज़
ज़हीर देहलवी
इश्क़ है इश्क़ तो इक रोज़ तमाशा होगा
ज़हीर देहलवी
इंसान वो क्या जिस को न हो पास ज़बाँ का
ज़हीर देहलवी
हुस्न की गर्मी-ए-बाज़ार इलाही तौबा
ज़हीर देहलवी
हम और चाह ग़ैर की अल्लाह से डरो
ज़हीर देहलवी