Couplets Poetry (page 23)

जिधर से खोल के बैठे थे दर अंधेरे का

ज़फ़र इक़बाल

झूट बोला है तो क़ाएम भी रहो उस पर 'ज़फ़र'

ज़फ़र इक़बाल

जैसी अब है ऐसी हालत में नहीं रह सकता

ज़फ़र इक़बाल

जहाँ से कुछ न मिले हुस्न-ए-माज़रत के सिवा

ज़फ़र इक़बाल

जब नज़ारे थे तो आँखों को नहीं थी परवा

ज़फ़र इक़बाल

इतना मानूस भी होने की ज़रूरत क्या थी

ज़फ़र इक़बाल

इश्क़ उदासी के पैग़ाम तो लाता रहता है दिन रात

ज़फ़र इक़बाल

इसे भी 'ज़फ़र' मेरी हिम्मत ही समझो

ज़फ़र इक़बाल

इस तरह भी चला है कभी कारोबार-ए-शौक़

ज़फ़र इक़बाल

इस बार मिली है जो नतीजे में बुराई

ज़फ़र इक़बाल

इंकिसारी में मिरा हुक्म भी जारी था 'ज़फ़र'

ज़फ़र इक़बाल

हुस्न उस का उसी मक़ाम पे है

ज़फ़र इक़बाल

हम पे दुनिया हुई सवार 'ज़फ़र'

ज़फ़र इक़बाल

हम इतनी रौशनी में देख भी सकते नहीं उस को

ज़फ़र इक़बाल

हवा शाख़ों में रुकने और उलझने को है इस लम्हे

ज़फ़र इक़बाल

हवा के साथ जो इक बोसा भेजता हूँ कभी

ज़फ़र इक़बाल

हाथ पैर आप ही मैं मार रहा हूँ फ़िलहाल

ज़फ़र इक़बाल

हर नया ज़ाइक़ा छोड़ा है जो औरों के लिए

ज़फ़र इक़बाल

हर बार मदद के लिए औरों को पुकारा

ज़फ़र इक़बाल

हमारा इश्क़ रवाँ है रुकावटों में 'ज़फ़र'

ज़फ़र इक़बाल

एक ना-मौजूदगी रह जाएगी चारों तरफ़

ज़फ़र इक़बाल

इक लहर है कि मुझ में उछलने को है 'ज़फ़र'

ज़फ़र इक़बाल

इक दूर के सफ़र पे रवाना भी हूँ 'ज़फ़र'

ज़फ़र इक़बाल

एक दिन सुब्ह जो उट्ठें तो ये दुनिया ही न हो

ज़फ़र इक़बाल

इक धूप सी तनी हुई बादल के आर-पार

ज़फ़र इक़बाल

दिन चढ़े होना न होना एक सा रह जाएगा

ज़फ़र इक़बाल

दिल से बाहर निकल आना मिरी मजबूरी है

ज़फ़र इक़बाल

दर-ए-उमीद से हो कर निकलने लगता हूँ

ज़फ़र इक़बाल

चूमने के लिए थाम रख्खूँ कोई दम वो हाथ

ज़फ़र इक़बाल

चेहरे से झाड़ पिछले बरस की कुदूरतें

ज़फ़र इक़बाल