Couplets Poetry (page 25)
देख लेते हैं अंधेरे में भी रस्ता अपना
ज़फर इमाम
बात पहुँचे समाअत को तासीर दे किस तरह
ज़फर इमाम
जाने किस किरदार की काई मेरे घर में आ पहुँची
ज़फ़र हमीदी
ज़ेहनों की कहीं जंग कहीं ज़ात का टकराव
ज़फ़र गोरखपुरी
उसे ठहरा सको इतनी भी तो वुसअत नहीं घर में
ज़फ़र गोरखपुरी
तंहाई को घर से रुख़्सत कर तो दो
ज़फ़र गोरखपुरी
शायद अब तक मुझ में कोई घोंसला आबाद है
ज़फ़र गोरखपुरी
शजर के क़त्ल में इस का भी हाथ है शायद
ज़फ़र गोरखपुरी
समुंदर ले गया हम से वो सारी सीपियाँ वापस
ज़फ़र गोरखपुरी
नहीं मालूम आख़िर किस ने किस को थाम रक्खा है
ज़फ़र गोरखपुरी
मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए
ज़फ़र गोरखपुरी
मैं 'ज़फ़र' ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में
ज़फ़र गोरखपुरी
कोई आँखों के शोले पोंछने वाला नहीं होगा
ज़फ़र गोरखपुरी
कितनी आसानी से मशहूर किया है ख़ुद को
ज़फ़र गोरखपुरी
ख़त लिख के कभी और कभी ख़त को जला कर
ज़फ़र गोरखपुरी
कैसी शब है एक इक करवट पे कट जाता है जिस्म
ज़फ़र गोरखपुरी
फ़लक ने भी न ठिकाना कहीं दिया हम को
ज़फ़र गोरखपुरी
देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे
ज़फ़र गोरखपुरी
छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद
ज़फ़र गोरखपुरी
अपने अतवार में कितना बड़ा शातिर होगा
ज़फ़र गोरखपुरी
अभी ज़िंदा हैं हम पर ख़त्म कर ले इम्तिहाँ सारे
ज़फ़र गोरखपुरी
आसमाँ ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से
ज़फ़र गोरखपुरी
आँखें यूँ ही भीग गईं क्या देख रहे हो आँखों में
ज़फ़र गोरखपुरी
तिरा यक़ीन हूँ मैं कब से इस गुमान में था
ज़फ़र गौरी
लोग समझे अपनी सच्चाई की ख़ातिर जान दी
ज़फ़र गौरी
दिल में रख ज़ख़्म-ए-नवा राह में काम आएगा
ज़फ़र गौरी
बे-चराग़ाँ बस्तियों को ज़िंदगी दे
ज़फ़र गौरी
ख़ून-ए-जिगर आँखों से बहाया ग़म का सहरा पार किया
ज़फ़र अनवर
दिल की ज़ख़्मों को किया करता है ताज़ा हर-दम
ज़फ़र अनवर
बात जब है कि हर इक फूल को यकसाँ समझो
ज़फ़र अनवर