Couplets Poetry (page 27)

क़ातिल तो सीना तान के चलते रहे यहाँ

युसूफ़ जमाल

पूछे जो ज़िंदगी की हक़ीक़त कोई 'जमाल'

युसूफ़ जमाल

जब मैं कच्चा फल था तो महफ़ूज़ था मैं

युसूफ़ जमाल

ढूँडते हो क्यूँ जली तहरीर के असबाक़ में

युसूफ़ जमाल

बौना था वो ज़रूर मगर इस के बावजूद

युसूफ़ जमाल

इसी पे शहर की सारी हवाएँ बरहम थीं

यूसुफ़ हसन

इसी खंडर में मिरे ख़्वाब की गली भी थी

यूसुफ़ हसन

सिमटे रहे तो दर्द की तन्हाइयाँ मिलीं

यूसुफ़ आज़मी

पानी की मौजों पे लिक्खी है लम्हों की बे-रूह कहानी

यूसुफ़ आज़मी

पलकें हैं कि सरगोशी में ख़ुश्बू का सफ़र है

यूसुफ़ आज़मी

मैं वक़्त के कोहराम में खो जाऊँ तो क्या ग़म

यूसुफ़ आज़मी

ज़िंदगी कोह-ए-बे-सुतूँ गोया

यज़दानी जालंधरी

शम्अ होगी सुब्ह तक बाक़ी न परवाने की ख़ाक

यज़दानी जालंधरी

मिला है तपता सहरा देखने को

यज़दानी जालंधरी

इज्ज़ के साथ चले आए हैं हम 'यज़्दानी'

यज़दानी जालंधरी

बज़्म-ए-वफ़ा सजी तो अजब सिलसिले हुए

यज़दानी जालंधरी

पर्दा आँखों से हटाने में बहुत देर लगी

यासमीन हामिद

एक दीवार उठाई थी बड़ी उजलत में

यासमीन हामिद

ज़रा धीमी हो तो ख़ुशबू भी भली लगती है

यासमीन हमीद

उस के शिकस्ता वार का भी रख लिया भरम

यासमीन हमीद

उस इमारत को गिरा दो जो नज़र आती है

यासमीन हमीद

समुंदर हो तो उस में डूब जाना भी रवा है

यासमीन हमीद

रस्ते से मिरी जंग भी जारी है अभी तक

यासमीन हमीद

मुसलसल एक ही तस्वीर चश्म-ए-तर में रही

यासमीन हमीद

मिरी हर बात पस-मंज़र से क्यूँ मंसूब होती है

यासमीन हमीद

मैं अब उस हर्फ़ से कतरा रही हूँ

यासमीन हमीद

क्यूँ ढूँडने निकले हैं नए ग़म का ख़ज़ीना

यासमीन हमीद

किसी के नर्म लहजे का क़रीना

यासमीन हमीद

ख़ुशी के दौर तो मेहमाँ थे आते जाते रहे

यासमीन हमीद

जो डुबोएगी न पहुँचाएगी साहिल पे हमें

यासमीन हमीद