Couplets Poetry (page 28)
जिस सम्त की हवा है उसी सम्त चल पड़ें
यासमीन हमीद
इतनी बे-रब्त कहानी नहीं अच्छी लगती
यासमीन हमीद
हमें ख़बर थी बचाने का उस में यारा नहीं
यासमीन हमीद
अपनी निगाह पर भी करूँ ए'तिबार क्या
यासमीन हमीद
अगर इतनी मुक़द्दम थी ज़रूरत रौशनी की
यासमीन हमीद
ये कमरा और ये गर्द-ओ-ग़ुबार उस का है
यासमीन हबीब
मुझ को उतार हर्फ़ में जान-ए-ग़ज़ल बना मुझे
यासमीन हबीब
मैं घर से जाऊँ तो ताला लगा के जाती हूँ
यासमीन हबीब
किसी ख़सारे के सौदे में हाथ आया था
यासमीन हबीब
किस की आँखों को नींद चुभती है
यासमीन हबीब
ख़ुद अपना साथ भी चुभने लगा था
यासमीन हबीब
कैसे हों ख़्वाब आँख में कैसा ख़याल दिल में हो
यासमीन हबीब
कैसा चेहरा है रात की तफ़्सील
यासमीन हबीब
जो चला गया सो चला गया जो है पास उस का ख़याल रख
यासमीन हबीब
जाती थी कोई राह अकेली किसी जानिब
यासमीन हबीब
हमें सैराब रक्खा है ख़ुदा का शुक्र है उस ने
यासमीन हबीब
हमें भी तजरबा है बे-घरी का छत न होने का
यासमीन हबीब
एक साया सा फ़ड़फ़ड़ाता है
यासमीन हबीब
अभी से अच्छा हुआ रात सो गई वर्ना
यासमीन हबीब
आते रहते हैं फ़लक से भी इशारे कुछ न कुछ
यासमीन हबीब
हम अपने आप तालिब मतलूब आप हम हैं
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
ढूँढ हम उन को परेशान बने बैठे हैं
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
बंदे का पर्दा शान-ए-इलाही छुपी हुई
यासीन अली ख़ाँ मरकज़
ये समझ कर फ़क़ीरी ही में है ख़ुदा
यशपाल गुप्ता
जो सुख के उजाले में था परछाईं हमारी
यशपाल गुप्ता
समझ सका न उसे मैं क़ुसूर मेरा है
यशब तमन्ना
पढ़ चुके हैं निसाब-ए-तंहाई
यशब तमन्ना
हक़ीक़तों से मफ़र चाही थी 'यशब' मैं ने
यशब तमन्ना
ज़ंजीर ज़ुल्फ़-ए-सियाह समुंदर निगाह-ए-शोख़
यासीन ज़मीर
मुमकिन है अश्क बन के रहूँ चश्म-ए-यार में
यासीन ज़मीर