Couplets Poetry (page 29)
मुद्दत हुई है दस्त-ओ-गरेबाँ हुए हमें
यासीन ज़मीर
कुछ वक़्त अपने साथ गुज़ारूँगा मैं 'ज़मीर'
यासीन ज़मीर
किस से करूँ मैं अपनी तबाही का अब गिला
यासीन ज़मीर
हर आँख इक सवाल तही-दस्त के लिए
यासीन ज़मीर
तू ला-मकाँ में रहे और मैं मकाँ में असीर
याक़ूब यावर
शहर-ए-सुख़न अजीब हो गया है
याक़ूब यावर
पहाड़ जैसी अज़्मतों का दाख़िला था शहर में
याक़ूब यावर
लहू महका तो सारा शहर पागल हो गया है
याक़ूब यावर
अगर वो आज रात हद्द-ए-इल्तिफ़ात तोड़ दे
याक़ूब यावर
आज भी ज़ख़्म ही खिलते हैं सर-ए-शाख़-ए-निहाल
याक़ूब यावर
सर के नीचे ईंट रख कर उम्र भर सोया है तू
याक़ूब आमिर
सच कहियो कि वाक़िफ़ हो मिरे हाल से 'आमिर'
याक़ूब आमिर
न समझे अश्क-फ़िशानी को कोई मायूसी
याक़ूब आमिर
मुझे भी ख़ुद न था एहसास अपने होने का
याक़ूब आमिर
मैं आज कल के तसव्वुर से शाद-काम तो हूँ
याक़ूब आमिर
हर नया रस्ता निकलता है जो मंज़िल के लिए
याक़ूब आमिर
धीरे धीरे सर में आ कर भर गया बरसों का शोर
याक़ूब आमिर
चैन ही कब लेने देता था किसी का ग़म हमें
याक़ूब आमिर
बज़्म में यूँ तो सभी थे फिर भी 'आमिर' देर तक
याक़ूब आमिर
बाद-ए-नफ़रत फिर मोहब्बत को ज़बाँ दरकार है
याक़ूब आमिर
ये वो आँसू हैं जिन से ज़ोहरा आतिशनाक हो जावे
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
उम्र फ़रियाद में बर्बाद गई कुछ न हुआ
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
तसव्वुर उस दहान-ए-तंग का रुख़्सत नहीं देता
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
सौ सौ हैं इल्तिफ़ात तग़ाफ़ुल में यार के
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
सरीर-ए-सल्तनत से आस्तान-ए-यार बेहतर था
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
मिस्र में हुस्न की वो गर्मी-ए-बाज़ार कहाँ
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
क्या बदन होगा कि जिस के खोलते जामे का बंद
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
ख़ल्वत हो और शराब हो माशूक़ सामने
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
इस अश्क ओ आह में सौदा बिगड़ न जाए कहीं
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
हक़ मुझे बातिल-आश्ना न करे
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन