Couplets Poetry (page 24)

चपातियाँ थीं बंधी पेट पर मगर शब-भर

ज़फ़र इक़बाल

बुझा नहीं मिरे अंदर का आफ़्ताब अभी

ज़फ़र इक़बाल

बुढ़ापे से अगली ये मंज़िल है कोई

ज़फ़र इक़बाल

भरी रहे अभी आँखों में उस के नाम की नींद

ज़फ़र इक़बाल

बाज़ार-ए-बोसा तेज़ से है तेज़-तर 'ज़फ़र'

ज़फ़र इक़बाल

बस एक बार किसी ने गले लगाया था

ज़फ़र इक़बाल

बारिश की बहुत तेज़ हवा में कहीं मुझ को

ज़फ़र इक़बाल

बाहर से चट्टान की तरह हूँ

ज़फ़र इक़बाल

बदन का सारा लहू खिंच के आ गया रुख़ पर

ज़फ़र इक़बाल

बात मुझ में भी कुछ इस तरह की होगी जो यहाँ

ज़फ़र इक़बाल

अपनी ये शान-ए-बग़ावत कोई देखे आ कर

ज़फ़र इक़बाल

अपनी मर्ज़ी से भी हम ने काम कर डाले हैं कुछ

ज़फ़र इक़बाल

अपने सोए हुए सूरज की ख़बर ले जा कर

ज़फ़र इक़बाल

अपने ही सामने दीवार बना बैठा हूँ

ज़फ़र इक़बाल

अंदर का ज़हर-नाक अँधेरा ही था बहुत

ज़फ़र इक़बाल

अभी मेरी अपनी समझ में भी नहीं आ रही

ज़फ़र इक़बाल

अब उस की दीद मोहब्बत नहीं ज़रूरत है

ज़फ़र इक़बाल

अब के इस बज़्म में कुछ अपना पता भी देना

ज़फ़र इक़बाल

आँखों में राख डाल के निकला हूँ सैर को

ज़फ़र इक़बाल

आँख के एक इशारे से किया गुल उस ने

ज़फ़र इक़बाल

आख़िर 'ज़फ़र' हुआ हूँ मंज़र से ख़ुद ही ग़ाएब

ज़फ़र इक़बाल

आज कल उस की तरह हम भी हैं ख़ाली ख़ाली

ज़फ़र इक़बाल

आगे बढ़ूँ तो ज़र्द घटा मेरे रू-ब-रू

ज़फ़र इक़बाल

आबा तो 'ज़फ़र' नहीं थे ऐसे

ज़फ़र इक़बाल

उजाला अपने घरौंदे में रह गया तो रात

ज़फर इमाम

साफ़ जज़्बों के हवाले से तो ग़म हैं लेकिन

ज़फर इमाम

क्या जाने कब धरती पर सैलाब का मंज़र हो जाए

ज़फर इमाम

जीवन का संगीत अचानक अंतिम सुर को छू लेता है

ज़फर इमाम

जल्द मंज़िल तक पहुँचने का जुनूँ उस को रहा

ज़फर इमाम

इक नदी में सैकड़ों दरिया की तुग़्यानी मिली

ज़फर इमाम