Couplets Poetry (page 503)

कर पहले दिल पे क़ाबू जामे की फिर ख़बर ले

आरज़ू लखनवी

कम न थी तेग़ से अदा-ए-ख़िराम

आरज़ू लखनवी

कम जो ठहरे जफ़ा से मेरी वफ़ा

आरज़ू लखनवी

कह के ये और कुछ कहा न गया

आरज़ू लखनवी

जोश-ए-जुनूँ में वो तिरे वहशी का चीख़ना

आरज़ू लखनवी

जो कान लगा कर सुनते हैं क्या जानें रुमूज़ मोहब्बत के

आरज़ू लखनवी

जो दिल रखते हैं सीने में वो काफ़िर हो नहीं सकते

आरज़ू लखनवी

जितने हुस्न-आबाद में पहोंचे होश-ओ-ख़िरद खो कर पहोंचे

आरज़ू लखनवी

जिस क़दर नफ़रत बढ़ाई उतनी ही क़ुर्बत बढ़ी

आरज़ू लखनवी

जज़्ब-ए-निगाह-ए-शोबदा-गर देखते रहे

आरज़ू लखनवी

जवाब देने के बदले वो शक्ल देखते हैं

आरज़ू लखनवी

जवाब देने के बदले वो शक्ल देखते हैं

आरज़ू लखनवी

इस छेड़ में बनते हैं होश्यार भी दीवाने

आरज़ू लखनवी

हुस्न ओ इश्क़ की लाग में अक्सर छेड़ उधर से होती है

आरज़ू लखनवी

हम को इतना भी रिहाई की ख़ुशी में नहीं होश

आरज़ू लखनवी

होश-ओ-बे-होशी की मंज़िल एक है रस्ते जुदा

आरज़ू लखनवी

हाथ से किस ने साग़र पटका मौसम की बे-कैफ़ी पर

आरज़ू लखनवी

हर टूटे हुए दिल की ढारस है तिरा वअ'दा

आरज़ू लखनवी

हर नफ़स इक शराब का हो घूँट

आरज़ू लखनवी

हर इक शाम कहती है फिर सुब्ह होगी

आरज़ू लखनवी

हमारी नाकामी-ए-वफ़ा ने ज़माने की खोल दी हैं आँखें

आरज़ू लखनवी

हल्का था नदामत से सरमाया इबादत का

आरज़ू लखनवी

है मोहब्बत ऐसी बंधी गिरह जो न एक हाथ से खुल सके

आरज़ू लखनवी

हद से टकराती है जो शय वो पलटती है ज़रूर

आरज़ू लखनवी

फ़ज़ा महदूद कब है ऐ दिल-ए-वहशी फ़लक कैसा

आरज़ू लखनवी

एक दिल पत्थर बने और एक दिल बन जाए मोम

आरज़ू लखनवी

दोस्त ने दिल को तोड़ के नक़्श-ए-वफ़ा मिटा दिया

आरज़ू लखनवी

दो तुंद हवाओं पर बुनियाद है तूफ़ाँ की

आरज़ू लखनवी

दिल की ज़िद इस लिए रख ली थी कि आ जाए क़रार

आरज़ू लखनवी

धारे से कभी कश्ती न हटी और सीधी घाट पर आ पहुँची

आरज़ू लखनवी