Couplets Poetry (page 502)
वाए ग़ुर्बत कि हुए जिस के लिए ख़ाना-ख़राब
आरज़ू लखनवी
तेरे तो ढंग हैं यही अपना बना के छोड़ दे
आरज़ू लखनवी
सीने में ज़ब्त-ए-ग़म से छाला उभर रहा है
आरज़ू लखनवी
शौक़ चढ़ती धूप जाता वक़्त घटती छाँव है
आरज़ू लखनवी
राहबर रहज़न न बन जाए कहीं इस सोच में
आरज़ू लखनवी
पूछा जो उन से चाँद निकलता है किस तरह
आरज़ू लखनवी
फिर चाहे तो न आना ओ आन बान वाले
आरज़ू लखनवी
फैल गई बालों में सपेदी चौंक ज़रा करवट तो बदल
आरज़ू लखनवी
निगाहें इस क़दर क़ातिल कि उफ़ उफ़
आरज़ू लखनवी
नज़र बचा के जो आँसू किए थे मैं ने पाक
आरज़ू लखनवी
नाम मंसूर का क़िस्मत ने उछाला वर्ना
आरज़ू लखनवी
नाले हैं दिलसिताँ तो फिर आहें हैं बर्छियाँ तो फिर
आरज़ू लखनवी
नहीं वो अगली सी रौनक़ दयार-ए-हस्ती की
आरज़ू लखनवी
मुझे रहने को वो मिला है घर कि जो आफ़तों की है रहगुज़र
आरज़ू लखनवी
मोहब्बत वहीं तक है सच्ची मोहब्बत
आरज़ू लखनवी
मोहब्बत नेक-ओ-बद को सोचने दे ग़ैर-मुमकिन है
आरज़ू लखनवी
मिसाल-ए-शम्अ अपनी आग में क्या आप जल जाऊँ
आरज़ू लखनवी
मासूम नज़र का भोला-पन ललचा के लुभाना क्या जाने
आरज़ू लखनवी
मख़रब-ए-कार हुई जोश में ख़ुद उजलत-ए-कार
आरज़ू लखनवी
लालच भरी मोहब्बत नज़रों से गिर न जाए
आरज़ू लखनवी
कुछ तो मिल जाए लब-ए-शीरीं से
आरज़ू लखनवी
कुछ कहते कहते इशारों में शर्मा के किसी का रह जाना
आरज़ू लखनवी
किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी
आरज़ू लखनवी
किस काम की ऐसी सच्चाई जो तोड़ दे उम्मीदें दिल की
आरज़ू लखनवी
किस गुल की बू है दामन-ए-दिल में बसी हुई
आरज़ू लखनवी
ख़ुशबू कहीं छुपी है मोहब्बत के फूल की
आरज़ू लखनवी
ख़िज़ाँ का भेस बना कर बहार ने मारा
आरज़ू लखनवी
ख़मोशी मेरी मअनी-ख़ेज़ थी ऐ आरज़ू कितनी
आरज़ू लखनवी
ख़मोश जलने का दिल के कोई गवाह नहीं
आरज़ू लखनवी
ख़ाली न अंदलीब का सोज़-ए-नफ़स गया
आरज़ू लखनवी