Couplets Poetry (page 501)
मोहब्बतें भी उसी आदमी का हिस्सा थीं
असअ'द बदायुनी
मेरी रुस्वाई के अस्बाब हैं मेरे अंदर
असअ'द बदायुनी
मिरे बदन पे ज़मानों की ज़ंग है लेकिन
असअ'द बदायुनी
लेता नहीं किसी का पस-ए-मर्ग कोई नाम
असअ'द बदायुनी
कोई हमदम नहीं दुनिया में लेकिन
असअ'द बदायुनी
कभी मौज-ए-ख़्वाब में खो गया कभी थक के रेत पे सो गया
असअ'द बदायुनी
जिसे पढ़ते तो याद आता था तेरा फूल सा चेहरा
असअ'द बदायुनी
जिसे न मेरी उदासी का कुछ ख़याल आया
असअ'द बदायुनी
जम गई धूल मुलाक़ात के आईनों पर
असअ'द बदायुनी
जब तलक आज़ाद थे हर इक मसाफ़त थी वबाल
असअ'द बदायुनी
हवा के अपने इलाक़े हवस के अपने मक़ाम
असअ'द बदायुनी
हवा दरख़्तों से कहती है दुख के लहजे में
असअ'द बदायुनी
ग़ैरों को क्या पड़ी है कि रुस्वा करें मुझे
असअ'द बदायुनी
गाँव की आँख से बस्ती की नज़र से देखा
असअ'द बदायुनी
देखने के लिए सारा आलम भी कम
असअ'द बदायुनी
चश्म-ए-इंकार में इक़रार भी हो सकता था
असअ'द बदायुनी
चमन वही कि जहाँ पर लबों के फूल खिलें
असअ'द बदायुनी
बिछड़ के तुझ से किसी दूसरे पे मरना है
असअ'द बदायुनी
बहुत से लोगों को मैं भी ग़लत समझता हूँ
असअ'द बदायुनी
आते हैं बर्ग-ओ-बार दरख़्तों के जिस्म पर
असअ'द बदायुनी
महसूस कर रहा हूँ ख़ुद अपने जमाल को
आरज़ू सहारनपुरी
कभी कभी तो इक ऐसा मक़ाम आया है
आरज़ू सहारनपुरी
गो सरापा-ए-जब्र हैं फिर भी
आरज़ू सहारनपुरी
भूल के कभी न फ़ाश कर राज़-ओ-नियाज़-ए-आशिक़ी
आरज़ू सहारनपुरी
ये गुल खिल रहा है वो मुरझा रहा है
आरज़ू लखनवी
वो क़िस्सा-ए-दर्द-आगीं चुप कर दिया था जिस ने
आरज़ू लखनवी
वो पलट के जल्द न आएँगे ये अयाँ है तर्ज़-ए-ख़िराम से
आरज़ू लखनवी
वो हाथ मार पलट कर जो कर दे काम तमाम
आरज़ू लखनवी
वहशत हम अपनी ब'अद-ए-फ़ना छोड़ जाएँ
आरज़ू लखनवी
वफ़ा तुम से करेंगे दुख सहेंगे नाज़ उठाएँगे
आरज़ू लखनवी