Couplets Poetry (page 610)

मैं जिस सुकून से बैठा हूँ इस किनारे पर

अब्बास ताबिश

मैं हूँ इस शहर में ताख़ीर से आया हुआ शख़्स

अब्बास ताबिश

मैं अपने आप में गहरा उतर गया शायद

अब्बास ताबिश

कुछ तो अपनी गर्दनें कज हैं हवा के ज़ोर से

अब्बास ताबिश

ख़ूब इतना था कि दीवार पकड़ कर निकला

अब्बास ताबिश

झोंके के साथ छत गई दस्तक के साथ दर गया

अब्बास ताबिश

इश्क़ कर के भी खुल नहीं पाया

अब्बास ताबिश

इस का मतलब है यहाँ अब कोई आएगा ज़रूर

अब्बास ताबिश

इल्तिजाएँ कर के माँगी थी मोहब्बत की कसक

अब्बास ताबिश

हम जुड़े रहते थे आबाद मकानों की तरह

अब्बास ताबिश

हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस

अब्बास ताबिश

हिज्र को हौसला और वस्ल को फ़ुर्सत दरकार

अब्बास ताबिश

हमें तो इस लिए जा-ए-नमाज़ चाहिए है

अब्बास ताबिश

हमारे जैसे वहाँ किस शुमार में होंगे

अब्बास ताबिश

घर पहुँचता है कोई और हमारे जैसा

अब्बास ताबिश

फ़क़त माल-ओ-ज़र-ए-दीवार-ओ-दर अच्छा नहीं लगता

अब्बास ताबिश

एक मुद्दत से मिरी माँ नहीं सोई 'ताबिश'

अब्बास ताबिश

इक मोहब्बत ही पे मौक़ूफ़ नहीं है 'ताबिश'

अब्बास ताबिश

दे इसे भी फ़रोग़-ए-हुस्न की भीक

अब्बास ताबिश

बोलता हूँ तो मिरे होंट झुलस जाते हैं

अब्बास ताबिश

बस एक मोड़ मिरी ज़िंदगी में आया था

अब्बास ताबिश

बैठे रहने से तो लौ देते नहीं ये जिस्म ओ जाँ

अब्बास ताबिश

अगर यूँही मुझे रक्खा गया अकेले में

अब्बास ताबिश

अभी तो घर में न बैठें कहो बुज़ुर्गों से

अब्बास ताबिश

आँखों तक आ सकी न कभी आँसुओं की लहर

अब्बास ताबिश

वो हब्स था कि तरसती थी साँस लेने को

अब्बास रिज़वी

वहशत के इस नगर में वो क़ौस-ए-क़ुज़ह से लोग

अब्बास रिज़वी

तमाम उम्र की बे-ताबियों का हासिल था

अब्बास रिज़वी

तलब करें तो ये आँखें भी इन को दे दूँ मैं

अब्बास रिज़वी

मैं जो चुप था हमा-तन-गोश थी बस्ती सारी

अब्बास रिज़वी