Couplets Poetry (page 97)

मैं सो रहा हूँ तिरे ख़्वाब देखने के लिए

शकील आज़मी

कुछ दिनों के लिए मंज़र से अगर हट जाओ

शकील आज़मी

ख़ुद को इतना भी न बचाया कर

शकील आज़मी

जब तलक उस ने हम से बातें कीं

शकील आज़मी

जाने कैसा रिश्ता है रहगुज़र का क़दमों से

शकील आज़मी

इस बार उस की आँखों में इतने सवाल थे

शकील आज़मी

हर घड़ी चश्म-ए-ख़रीदार में रहने के लिए

शकील आज़मी

हादसे शहर का दस्तूर बने जाते हैं

शकील आज़मी

घर के दीवार-ओ-दर पे शाम ही से

शकील आज़मी

बिछड़ के भी वो मिरे साथ ही रहा हर दम

शकील आज़मी

भूक में इश्क़ की तहज़ीब भी मर जाती है

शकील आज़मी

बस इक पुकार पे दरवाज़ा खोल देते हैं

शकील आज़मी

बात से बात की गहराई चली जाती है

शकील आज़मी

अपनी मंज़िल पे पहुँचना भी खड़े रहना भी

शकील आज़मी

आज आँखों में कोई रात गए आएगा

शकील आज़मी

यूँ तो सारा चमन हमारा है

शकेब जलाली

ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ कहाँ बरसे

शकेब जलाली

वक़्त ने ये कहा है रुक रुक कर

शकेब जलाली

वक़्त की डोर ख़ुदा जाने कहाँ से टूटे

शकेब जलाली

वहाँ की रौशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत

शकेब जलाली

उतर के नाव से भी कब सफ़र तमाम हुआ

शकेब जलाली

तू ने कहा न था कि मैं कश्ती पे बोझ हूँ

शकेब जलाली

सोचो तो सिलवटों से भरी है तमाम रूह

शकेब जलाली

'शकेब' अपने तआरुफ़ के लिए ये बात काफ़ी है

शकेब जलाली

रहता था सामने तिरा चेहरा खुला हुआ

शकेब जलाली

प्यार की जोत से घर घर है चराग़ाँ वर्ना

शकेब जलाली

न इतनी तेज़ चले सर-फिरी हवा से कहो

शकेब जलाली

मुझ से मिलने शब-ए-ग़म और तो कौन आएगा

शकेब जलाली

मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ

शकेब जलाली

मल्बूस ख़ुश-नुमा हैं मगर जिस्म खोखले

शकेब जलाली