Couplets Poetry (page 98)

लोग दुश्मन हुए उसी के 'शकेब'

शकेब जलाली

लोग देते रहे क्या क्या न दिलासे मुझ को

शकेब जलाली

क्या कहूँ दीदा-ए-तर ये तो मिरा चेहरा है

शकेब जलाली

कोई इस दिल का हाल क्या जाने

शकेब जलाली

कोई भूला हुआ चेहरा नज़र आए शायद

शकेब जलाली

कहता है आफ़्ताब ज़रा देखना कि हम

शकेब जलाली

जो मोतियों की तलब ने कभी उदास किया

शकेब जलाली

जाती है धूप उजले परों को समेट के

शकेब जलाली

जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है

शकेब जलाली

इस शोर-ए-तलातुम में कोई किस को पुकारे

शकेब जलाली

हम-सफ़र रह गए बहुत पीछे

शकेब जलाली

गले मिला न कभी चाँद बख़्त ऐसा था

शकेब जलाली

फ़सील-ए-जिस्म पे ताज़ा लहू के छींटे हैं

शकेब जलाली

एक अपना दिया जलाने को

शकेब जलाली

दिल सा अनमोल रतन कौन ख़रीदेगा 'शकेब'

शकेब जलाली

बस एक रात ठहरना है क्या गिला कीजे

शकेब जलाली

बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका

शकेब जलाली

अभी अरमान कुछ बाक़ी हैं दिल में

शकेब जलाली

आलम में जिस की धूम थी उस शाहकार पर

शकेब जलाली

आज भी शायद कोई फूलों का तोहफ़ा भेज दे

शकेब जलाली

आ के पत्थर तो मिरे सेहन में दो-चार गिरे

शकेब जलाली

शाम को सुब्ह से ताबीर करो तुम लेकिन

शाइक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

ज़ुल्फ़ों की नागनी तो तिरी हम ने केलियाँ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

ज़र्फ़ टूटा तो वस्ल होता है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

ज़ाहिदो उठ जाओ मज्लिस से कि आज

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

ज़ाहिद को हम ने देख ख़राबात में कहा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

यूँ न हो यूँ हो यूँ हुआ सो क्यूँ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

ये मसला शैख़ से पूछो हम इस झगड़े से फ़ारिग़ है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

ये किस मज़हब में और मशरब में है हिन्दू मुसलमानो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

वो वहशी इस क़दर भड़का है सूरत से मिरे यारो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम