Couplets Poetry (page 100)

साहिबान-ए-क़स्र को मिलती नहीं है ब'अद-ए-मर्ग

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

साफ़ दिल है तो आ कुदूरत छोड़

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

सब्र बिन और कुछ न लो हमराह

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रुख़्सार के अरक़ का तिरे भाव देख कर

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रिश्ता-ए-उमर-दराज़ अपना मैं कोताह करूँ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रिआयत बूझ तू माशूक़ का जौर

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रखता है इबादत के लिए हसरत-ए-जन्नत

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रखे है शीशा मिरा संग साथ रब्त-ए-क़दीम

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रहन-ए-शराब-ख़ाना किया शैख़ हैफ़ है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

राह में ग़म-ज़दा-ए-इश्क़ को क्या टोको हो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रात उस की महफ़िल में सर से जल के पाँव तक

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रात मेरे फ़ुग़ाँ-ओ-नाले से

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रात दिन यार बग़ल में हो तो घर बेहतर है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रात दिन जारी हैं कुछ पैदा नहीं इन का कनार

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

क़ुर्बान सौ तरह से किया तुझ पर आप को

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

क़िस्सा-ए-मजनूँ-ओ-फ़र्हाद भी इक पर्दा है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

क़यामत तक जुदा होवे न या-रब

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

फड़कूँ तो सर फटे है न फड़कूँ तो जी घटे

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

पहन कर जामा बसंती जो वो निकला घर सूँ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

पगड़ी अपनी यहाँ सँभाल चलो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

पड़ी फिरती हैं कई लैला-ओ-शीरीं हर जा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

निगाहें जोड़ और आँखें चुरा टुक चल के फिर देखा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

ने काबा की हवस न हवा-ए-कुनिश्त है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

नज़र में उस की जो चढ़ता है सो जीता नहीं बचता

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

नज़र में बंद करे है तू एक आलम को

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

नौ-जवानों को देख कर 'हातिम'

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

नासूर की सिफ़त है न होगा कभू वो बंद

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

नासेह बग़ल में आ कर दुश्मन हुआ हमारा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

नमाज़ियों ने तुझ अबरू को देख मस्जिद में

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

नमक-ए-हुस्न का सुनता हूँ तिरे जूँ जूँ शोर

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम