Couplets Poetry (page 208)
चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया
परवीन शाकिर
बोझ उठाते हुए फिरती है हमारा अब तक
परवीन शाकिर
बोझ उठाए हुए फिरती है हमारा अब तक
परवीन शाकिर
बस ये हुआ कि उस ने तकल्लुफ़ से बात की
परवीन शाकिर
बारहा तेरा इंतिज़ार किया
परवीन शाकिर
बंद कर के मिरी आँखें वो शरारत से हँसे
परवीन शाकिर
बख़्त से कोई शिकायत है न अफ़्लाक से है
परवीन शाकिर
बहुत से लोग थे मेहमान मेरे घर लेकिन
परवीन शाकिर
बदन के कर्ब को वो भी समझ न पाएगा
परवीन शाकिर
बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की
परवीन शाकिर
अपने क़ातिल की ज़ेहानत से परेशान हूँ मैं
परवीन शाकिर
अक्स-ए-ख़ुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोई
परवीन शाकिर
अजब नहीं है कि दिल पर जमी मिली काई
परवीन शाकिर
अब्र बरसे तो इनायत उस की
परवीन शाकिर
अब उन दरीचों पे गहरे दबीज़ पर्दे हैं
परवीन शाकिर
अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं
परवीन शाकिर
अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है
परवीन शाकिर
ज़मीं को ऐ ख़ुदा वो ज़लज़ला दे
परवीन कुमार अश्क
फलदार था तो गाँव उसे पूजता रहा
परवीन कुमार अश्क
किसी किसी को थमाता है चाबियाँ घर की
परवीन कुमार अश्क
हवेलियाँ भी हैं कारें भी कार-ख़ाने भी
परवीन कुमार अश्क
तेरी पहचान के लाखों अंदाज़
परवीन फ़ना सय्यद
मेरी आँखों में उतरने वाले
परवीन फ़ना सय्यद
खुल के रो लूँ तो ज़रा जी सँभले
परवीन फ़ना सय्यद
वक़्त ने सब भुला दिया 'परतव'
परतव रोहिला
यूँ तो अपनों सा कुछ नहीं इस में
प्रकाश फ़िक्री
मुर्दा पड़े थे लोग घरों की पनाह में
प्रकाश फ़िक्री
लर्ज़ां है किसी ख़ौफ़ से जो शाम का चेहरा
प्रकाश फ़िक्री
जिधर देखो लहू बिखरा हुआ है
प्रकाश फ़िक्री
जले मकानों में भूत बैठे बड़ी मतानत से सोचते हैं
प्रकाश फ़िक्री