Couplets Poetry (page 207)
कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी
परवीन शाकिर
कल रात जो ईंधन के लिए कट के गिरा है
परवीन शाकिर
कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
परवीन शाकिर
कभी कभार उसे देख लें कहीं मिल लें
परवीन शाकिर
जुस्तुजू खोए हुओं की उम्र भर करते रहे
परवीन शाकिर
जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करें
परवीन शाकिर
जिस तरह ख़्वाब मिरे हो गए रेज़ा रेज़ा
परवीन शाकिर
जिस जा मकीन बनने के देखे थे मैं ने ख़्वाब
परवीन शाकिर
इतने घने बादल के पीछे
परवीन शाकिर
इसी तरह से अगर चाहता रहा पैहम
परवीन शाकिर
हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँ
परवीन शाकिर
हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँ
परवीन शाकिर
हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँ
परवीन शाकिर
हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा
परवीन शाकिर
हथेलियों की दुआ फूल बन के आई हो
परवीन शाकिर
हाथ मेरे भूल बैठे दस्तकें देने का फ़न
परवीन शाकिर
हारने में इक अना की बात थी
परवीन शाकिर
गुलाबी पाँव मिरे चम्पई बनाने को
परवीन शाकिर
घर आप ही जगमगा उठेगा
परवीन शाकिर
ग़ैर-मुमकिन है तिरे घर के गुलाबों का शुमार
परवीन शाकिर
ग़ैर मुमकिन है तिरे घर के गुलाबों का शुमार
परवीन शाकिर
गवाही कैसे टूटती मुआमला ख़ुदा का था
परवीन शाकिर
एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा
परवीन शाकिर
इक नाम क्या लिखा तिरा साहिल की रेत पर
परवीन शाकिर
एक मुश्त-ए-ख़ाक और वो भी हवा की ज़द में है
परवीन शाकिर
दुश्मनों के साथ मेरे दोस्त भी आज़ाद हैं
परवीन शाकिर
दिल अजब शहर कि जिस पर भी खुला दर उस का
परवीन शाकिर
देने वाले की मशिय्यत पे है सब कुछ मौक़ूफ़
परवीन शाकिर
दरवाज़ा जो खोला तो नज़र आए खड़े वो
परवीन शाकिर
चेहरा ओ नाम एक साथ आज न याद आ सके
परवीन शाकिर