Couplets Poetry (page 205)
अगर लोहे के गुम्बद में रखेंगे अक़रबा उन को
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ज़ुल्म सहना भी तो ज़ालिम की हिमायत ठहरा
परवीन शाकिर
ज़िंदगी मेरी थी लेकिन अब तो
परवीन शाकिर
यूँ देखना उस को कि कोई और न देखे
परवीन शाकिर
यूँ बिछड़ना भी बहुत आसाँ न था उस से मगर
परवीन शाकिर
ये क्या कि वो जब चाहे मुझे छीन ले मुझ से
परवीन शाकिर
ये हवा कैसे उड़ा ले गई आँचल मेरा
परवीन शाकिर
यही वो दिन थे जब इक दूसरे को पाया था
परवीन शाकिर
वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
परवीन शाकिर
वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी
परवीन शाकिर
वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया
परवीन शाकिर
वो मेरे पाँव को छूने झुका था जिस लम्हे
परवीन शाकिर
वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया
परवीन शाकिर
उस ने मुझे दर-अस्ल कभी चाहा ही नहीं था
परवीन शाकिर
उस ने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा
परवीन शाकिर
उस के यूँ तर्क-ए-मोहब्बत का सबब होगा कोई
परवीन शाकिर
तुझे मनाऊँ कि अपनी अना की बात सुनूँ
परवीन शाकिर
तू बदलता है तो बे-साख़्ता मेरी आँखें
परवीन शाकिर
तितलियाँ पकड़ने में दूर तक निकल जाना
परवीन शाकिर
थक गया है दिल-ए-वहशी मिरा फ़रियाद से भी
परवीन शाकिर
तिरी चाहत के भीगे जंगलों में
परवीन शाकिर
तेरे तोहफ़े तो सब अच्छे हैं मगर मौज-ए-बहार
परवीन शाकिर
तेरे पैमाने में गर्दिश नहीं बाक़ी साक़ी
परवीन शाकिर
तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ साथ
परवीन शाकिर
सुपुर्द कर के उसे चाँदनी के हाथों में
परवीन शाकिर
सिर्फ़ इस तकब्बुर में उस ने मुझ को जीता था
परवीन शाकिर
शाम पड़ते ही किसी शख़्स की याद
परवीन शाकिर
शब वही लेकिन सितारा और है
परवीन शाकिर
शब की तन्हाई में अब तो अक्सर
परवीन शाकिर
रुख़्सत करने के आदाब निभाने ही थे
परवीन शाकिर