Couplets Poetry (page 206)
रस्ते में मिल गया तो शरीक-ए-सफ़र न जान
परवीन शाकिर
रफ़ाक़तों के नए ख़्वाब ख़ुशनुमा हैं मगर
परवीन शाकिर
रफ़ाक़तों का मिरी उस को ध्यान कितना था
परवीन शाकिर
राय पहले से बना ली तू ने
परवीन शाकिर
रात के शायद एक बजे हैं
परवीन शाकिर
क़दमों में भी तकान थी घर भी क़रीब था
परवीन शाकिर
पास जब तक वो रहे दर्द थमा रहता है
परवीन शाकिर
पा-ब-गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन
परवीन शाकिर
नहीं नहीं ये ख़बर दुश्मनों ने दी होगी
परवीन शाकिर
न जाने कौन सा आसेब दिल में बस्ता है
परवीन शाकिर
मुमकिना फ़ैसलों में एक हिज्र का फ़ैसला भी था
परवीन शाकिर
मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर
परवीन शाकिर
मेरी चादर तो छिनी थी शाम की तन्हाई में
परवीन शाकिर
मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गईं
परवीन शाकिर
मसअला जब भी चराग़ों का उठा
परवीन शाकिर
मक़्तल-ए-वक़्त में ख़ामोश गवाही की तरह
परवीन शाकिर
मैं उस की दस्तरस में हूँ मगर वो
परवीन शाकिर
मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी
परवीन शाकिर
मैं फूल चुनती रही और मुझे ख़बर न हुई
परवीन शाकिर
लड़कियों के दुख अजब होते हैं सुख उस से अजीब
परवीन शाकिर
कुछ तो तिरे मौसम ही मुझे रास कम आए
परवीन शाकिर
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
परवीन शाकिर
कुछ फ़ैसला तो हो कि किधर जाना चाहिए
परवीन शाकिर
कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की
परवीन शाकिर
किसी के ध्यान में डूबा हुआ दिल
परवीन शाकिर
ख़ुद अपने से मिलने का तो यारा न था मुझ में
परवीन शाकिर
कौन जाने कि नए साल में तू किस को पढ़े
परवीन शाकिर
कौन जाने कि नए साल में तू किस को पढ़े
परवीन शाकिर
काँटों में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन
परवीन शाकिर
काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तन्हाई में
परवीन शाकिर