Couplets Poetry (page 204)

पी बादा-ए-अहमर तो ये कहने लगा गुल-रू

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

पौ फटते ही 'रियाज़' जहाँ ख़ुल्द बन गया

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

निकले हैं घर से देखने को लोग माह-ए-ईद

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

न आया कर के व'अदा वस्ल का इक़रार था क्या था

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

मुझे जब मार ही डाला तो अब दोनों बराबर हैं

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

मुद्दत से इश्तियाक़ है बोस-ओ-कनार का

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

मिरी क़िस्मत लिखी जाती थी जिस दिन मैं अगर होता

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

मर चुका मैं तो नहीं इस से मुझे कुछ हासिल

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

मख़्लूक़ को तुम्हारी मोहब्बत में ऐ बुतो

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

क्यूँ उजाड़ा ज़ाहिदो बुत-ख़ाना-ए-आबाद को

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

कुछ तो कमी हो रोज़-ए-जज़ा के अज़ाब में

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

किसी के संग-ए-दर से एक मुद्दत सर नहीं उट्ठा

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

किस तरह कर दिया दिल-ए-नाज़ुक को चूर-चूर

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

कभी न जाएगा आशिक़ से देख-भाल का रोग

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

जुनूँ होता है छा जाती है हैरत

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

जाँ घुल चुकी है ग़म में इक तन है वो भी मोहमल

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

होती न शरीअ'त में परस्तिश कभी ममनूअ

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

हवा में जब उड़ा पर्दा तो इक बिजली सी कौंदी थी

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

गर आप पहले रिश्ता-ए-उल्फ़त न तोड़ते

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

फ़र्क़ क्या मक़्तल में और गुलज़ार में

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

इक अदना सा पर्दा है इक अदना सा तफ़ावुत

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

दिए जाएँगे कब तक शैख़-साहिब कुफ़्र के फ़तवे

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

दिलवाइए बोसा ध्यान भी है

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

देखने वाले ये कहते हैं किताब-ए-दहर में

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

चुभेंगे ज़ीरा-हा-ए-शीशा-ए-दिल दस्त-ए-नाज़ुक में

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

भेज तो दी है ग़ज़ल देखिए ख़ुश हों कि न हों

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

बद-क़िस्मतों को गर हो मयस्सर शब-ए-विसाल

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

बाल रुख़्सारों से जब उस ने हटाए तो खुला

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

ऐ सबा चलती है क्यूँ इस दर्जा इतराई हुई

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़

अहल-ए-दुनिया बावले हैं बावलों की तू न सुन

परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़