Couplets Poetry (page 202)
शाम हुई तो सूरज सोचे
प्रेम भण्डारी
सारी सारी रात मैं जागा
प्रेम भण्डारी
सारी बे-रंग सोच के चेहरे
प्रेम भण्डारी
रंग तेरा उड़ा उड़ा सा है
प्रेम भण्डारी
पहली साँस पे मैं रोया था आख़िरी साँस पे दुनिया
प्रेम भण्डारी
मुझ को याद रहा तू भूला
प्रेम भण्डारी
मेरी शोहरत के पीछे है
प्रेम भण्डारी
मैं तो सब कुछ भूल चुका हूँ
प्रेम भण्डारी
कुछ रिश्ते हैं जिन की ख़ातिर
प्रेम भण्डारी
खेल-कूद कर शाम ढले क्यूँ
प्रेम भण्डारी
कैसे तन्हा रात कटेगी
प्रेम भण्डारी
जिस पर तमाम उम्र बहुत नाज़ था मुझे
प्रेम भण्डारी
जाने क्यूँ लोग मिरा नाम पढ़ा करते हैं
प्रेम भण्डारी
छुपी है अन-गिनत चिंगारियाँ लफ़्ज़ों के दामन में
प्रेम भण्डारी
भीक दे कर न जाने क्या लेंगे
प्रेम भण्डारी
आग लगाई तुम ने ही तो
प्रेम भण्डारी
मंगल को बजरंग-बली से तेरा शुक्र मनाऊँ
प्रबुद्ध सौरभ
उस की ख़्वाहिश है कि अब लोग न रोएँ न हँसें
पीरज़ादा क़ासीम
तुम्हें जफ़ा से न यूँ बाज़ आना चाहिए था
पीरज़ादा क़ासीम
शहर तलब करे अगर तुम से इलाज-ए-तीरगी
पीरज़ादा क़ासीम
इक सज़ा और असीरों को सुना दी जाए
पीरज़ादा क़ासीम
दीदनी है तिरे इ'ताब का रंग
पिन्हाँ सिपहर आरा ख़ातून
ज़ीस्त ने मुर्दा बना रक्खा था मुझ को हिज्र में
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
सुना है अर्श-ए-इलाही इसी को कहते हैं
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
शब-ए-वस्ल आज वो ताकीद करते हैं मोहब्बत से
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
फट जाते हैं ज़ख़्म-ए-दिल-ए-बेताब के अंगूर
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
नाख़ुन का रंग सीना-ख़राशी से ये हुआ
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
न तो मैं हूर का मफ़्तूँ न परी का आशिक़
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
कुंदनी रंग का मैं कुश्ता हूँ
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
किसी की ज़ुल्फ़ के सौदे में रात की है बसर
पीर शेर मोहम्मद आजिज़