Couplets Poetry (page 201)
दिन छुपा और ग़म के साए ढले
क़ाबिल अजमेरी
बहुत काम लेने हैं दर्द-ए-जिगर से
क़ाबिल अजमेरी
अभी तो तन्क़ीद हो रही है मिरे मज़ाक़-ए-जुनूँ पे लेकिन
क़ाबिल अजमेरी
अब ये आलम है कि ग़म की भी ख़बर होती नहीं
क़ाबिल अजमेरी
आज 'क़ाबिल' मय-कदे में इंक़लाब आने को है
क़ाबिल अजमेरी
आज जुनूँ के ढंग नए हैं
क़ाबिल अजमेरी
वो किस का है इस से क्या लेना देना
पूजा भाटिया
वो जो पहला था अपना इश्क़ वही
पूजा भाटिया
उस की बेचैनी बढ़ाना चाहती हूँ
पूजा भाटिया
क़त्ल करना तो इस को ठीक नहीं
पूजा भाटिया
एक इसी बात का था डर उस को
पूजा भाटिया
चलते चलते अक्सर रुक कर सोचा भी
पूजा भाटिया
मेरी तन्हाई की पगडंडी पर
प्रीतपाल सिंह बेताब
तुम ने लिक्खा है मिरे ख़त मुझे वापस कर दो
प्रेम वारबर्टनी
कभी खोले तो कभी ज़ुल्फ़ को बिखराए है
प्रेम वारबर्टनी
आख़िर उस की सूखी लकड़ी एक चिता के काम आई
प्रेम वारबर्टनी
उसी के ज़िक्र से हम शहर में हुए बदनाम
प्रेम कुमार नज़र
रख दी है उस ने खोल के ख़ुद जिस्म की किताब
प्रेम कुमार नज़र
में भी तलाश-ए-आब-ए-हवस में निकला हूँ
प्रेम कुमार नज़र
लफ़्ज़ छिन जाएँ मगर तहरीर हो रौशन जहाँ
प्रेम कुमार नज़र
कहें हैं रेख़्ता पंजाब में नज़र-साहिब
प्रेम कुमार नज़र
जी चाहता है हाथ लगा कर भी देख लें
प्रेम कुमार नज़र
हो रहा है पस-ए-दीवार भी कुछ
प्रेम कुमार नज़र
एक अंगड़ाई से सारे शहर को नींद आ गई
प्रेम कुमार नज़र
दिल-ए-तबाह की ईज़ा-परस्तियाँ मालूम
प्रेम कुमार नज़र
बहुत लम्बी मसाफ़त है बदन की
प्रेम कुमार नज़र
आएगी हर तरफ़ से हवा दस्तकें लिए
प्रेम कुमार नज़र
तेरी चाहत की है इतनी शिद्दत
प्रेम भण्डारी
तेरे मेरे बीच नहीं है ख़ून का रिश्ता फिर भी क्यूँ
प्रेम भण्डारी
शंकर बना के लोग मुझे पूजते रहे
प्रेम भण्डारी