Couplets Poetry (page 210)
लाए उस बुत को इल्तिजा कर के
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
क्या लुत्फ़ जो ग़ैर पर्दा खोले
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
कूचा-ए-जानाँ की मिलती थी न राह
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
जुनूँ की चाक-ज़नी ने असर किया वाँ भी
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
जो दिन को निकलो तो ख़ुर्शीद गिर्द-ए-सर घूमे
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
जब न जीते-जी मिरे काम आएगी
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
जब मिले दो दिल मुख़िल फिर कौन है
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
दोज़ख़ ओ जन्नत हैं अब मेरी नज़र के सामने
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
चला दुख़्तर-ए-रज़ को ले कर जो साक़ी
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
बुतों की गली छोड़ कर कौन जाए
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
ये जिस्म तंग है सीने में भी लहु कम है
पल्लव मिश्रा
वो नशा है कि ज़बाँ अक़्ल से करती है फ़रेब
पल्लव मिश्रा
वो नशा है के ज़बाँ अक़्ल से करती है फ़रेब
पल्लव मिश्रा
तमाम होश ज़ब्त इल्म मस्लहत के बा'द भी
पल्लव मिश्रा
मकीन-ए-दिल को ख़ानुमा-ख़राबियों से इश्क़ था
पल्लव मिश्रा
आँसुओं से मिरे काँधे को डुबोने वाले
पल्लव मिश्रा
आँसुओं में मिरे काँधे को डुबोने वाले
पल्लव मिश्रा
सुर्ख़ मौसम की कहानी तो पुरानी हो गई
पी पी श्रीवास्तव रिंद
रात हम ने जुगनुओं की सब दुकानें बेच दीं
पी पी श्रीवास्तव रिंद
कोई दस्तक न कोई आहट थी
पी पी श्रीवास्तव रिंद
ख़्वाहिशों की आँच में तपते बदन की लज़्ज़तें हैं
पी पी श्रीवास्तव रिंद
चाहता है दिल किसी से राज़ की बातें करे
पी पी श्रीवास्तव रिंद
बर्फ़-मंज़र धूल के बादल हवा के क़हक़हे
पी पी श्रीवास्तव रिंद
आसूदगी ने थपकियाँ दे कर सुला दिया
पी पी श्रीवास्तव रिंद
आस्तीनों में छुपा कर साँप भी लाए थे लोग
पी पी श्रीवास्तव रिंद
करता रहा मैं मिन्नतें कम की न कुछ दुआ
उज़ैर रहमान
है प्यार का ये खेल कहाँ मक्र से ख़ाली
उज़ैर रहमान
इश्क़ की तमन्ना थी इश्क़ की तमन्ना है
ओवैस उल हसन खान
ये ज़ीस्त कि है फूल सी मिट जाए बला से
ओवेस अहमद दौराँ
ये सेहन-ए-गुलिस्ताँ नहीं मक़्तल है रफ़ीक़ो!
ओवेस अहमद दौराँ