Couplets Poetry (page 212)

ये किस का चेहरा दमकता है मेरी आँखों में

उबैदुल्लह सिद्दीक़ी

ये आँखें ये दिमाग़ ये ज़ख़्मों का घर बदन

उबैदुल्लह सिद्दीक़ी

शाम होती है तो मेरा ही फ़साना अक्सर

उबैदुल्लह सिद्दीक़ी

पहले चिंगारी से इक शोला बनाता है मुझे

उबैदुल्लह सिद्दीक़ी

इसी फ़लक से उतरता है ये अंधेरा भी

उबैदुल्लह सिद्दीक़ी

सोहबत न रख अग़्यार सूँ बेज़ार मत कर यार कूँ

उबैदुल्लाह ख़ाँ मुब्तला

रास्ती से तुझ कूँ करना है निबाह

उबैदुल्लाह ख़ाँ मुब्तला

ख़ुदा आख़िर करेगा ख़ुश मिरा दिल

उबैदुल्लाह ख़ाँ मुब्तला

ज़मीं के लोग तो क्या दो दिलों की चाहत में

उबैदुल्लाह अलीम

ज़मीन जब भी हुई कर्बला हमारे लिए

उबैदुल्लाह अलीम

ये कैसी बिछड़ने की सज़ा है

उबैदुल्लाह अलीम

तुम हम-सफ़र हुए तो हुई ज़िंदगी अज़ीज़

उबैदुल्लाह अलीम

तुम अपने रंग नहाओ मैं अपनी मौज उड़ूँ

उबैदुल्लाह अलीम

तू बू-ए-गुल है और परेशाँ हुआ हूँ मैं

उबैदुल्लाह अलीम

सुख़न में सहल नहीं जाँ निकाल कर रखना

उबैदुल्लाह अलीम

सुब्ह-ए-चमन में एक यही आफ़्ताब था

उबैदुल्लाह अलीम

शिकस्ता-हाल सा बे-आसरा सा लगता है

उबैदुल्लाह अलीम

शायद कि ख़ुदा में और मुझ में

उबैदुल्लाह अलीम

शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ

उबैदुल्लाह अलीम

रौशनी आधी इधर आधी उधर

उबैदुल्लाह अलीम

फिर इस तरह कभी सोया न इस तरह जागा

उबैदुल्लाह अलीम

पलट सकूँ ही न आगे ही बढ़ सकूँ जिस पर

उबैदुल्लाह अलीम

मुझ से मिरा कोई मिलने वाला

उबैदुल्लाह अलीम

मैं उस को भूल गया हूँ वो मुझ को भूल गया

उबैदुल्लाह अलीम

मैं तन्हा था मैं तन्हा हूँ

उबैदुल्लाह अलीम

मैं एक से किसी मौसम मैं रह नहीं सकता

उबैदुल्लाह अलीम

कोई और तो नहीं है पस-ए-ख़ंजर-आज़माई

उबैदुल्लाह अलीम

ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ

उबैदुल्लाह अलीम

ख़ुर्शीद मिसाल शख़्स कल शाम

उबैदुल्लाह अलीम

खा गया इंसाँ को आशोब-ए-मआश

उबैदुल्लाह अलीम