Couplets Poetry (page 213)

काश देखो कभी टूटे हुए आईनों को

उबैदुल्लाह अलीम

कल मातम बे-क़ीमत होगा आज उन की तौक़ीर करो

उबैदुल्लाह अलीम

जो दिल को है ख़बर कहीं मिलती नहीं ख़बर

उबैदुल्लाह अलीम

जो आ रही है सदा ग़ौर से सुनो उस को

उबैदुल्लाह अलीम

जिस को मिलना नहीं फिर उस से मोहब्बत कैसी

उबैदुल्लाह अलीम

जवानी क्या हुई इक रात की कहानी हुई

उबैदुल्लाह अलीम

जब मिला हुस्न भी हरजाई तो उस बज़्म से हम

उबैदुल्लाह अलीम

इंसान हो किसी भी सदी का कहीं का हो

उबैदुल्लाह अलीम

हज़ार तरह के सदमे उठाने वाले लोग

उबैदुल्लाह अलीम

हज़ार राह चले फिर वो रहगुज़र आई

उबैदुल्लाह अलीम

हवा के दोश पे रक्खे हुए चराग़ हैं हम

उबैदुल्लाह अलीम

हाए वो लोग गए चाँद से मिलने और फिर

उबैदुल्लाह अलीम

एक चेहरे में तो मुमकिन नहीं इतने चेहरे

उबैदुल्लाह अलीम

दोस्तो जश्न मनाओ कि बहार आई है

उबैदुल्लाह अलीम

दरूद पढ़ते हुए उस की दीद को निकलें

उबैदुल्लाह अलीम

बोले नहीं वो हर्फ़ जो ईमान में न थे

उबैदुल्लाह अलीम

बड़ी आरज़ू थी हम को नए ख़्वाब देखने की

उबैदुल्लाह अलीम

अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए

उबैदुल्लाह अलीम

ऐ मेरे ख़्वाब आ मिरी आँखों को रंग दे

उबैदुल्लाह अलीम

अहल-ए-दिल के दरमियाँ थे 'मीर' तुम

उबैदुल्लाह अलीम

अगर हों कच्चे घरोंदों में आदमी आबाद

उबैदुल्लाह अलीम

अब तो मिल जाओ हमें तुम कि तुम्हारी ख़ातिर

उबैदुल्लाह अलीम

आओ तुम ही करो मसीहाई

उबैदुल्लाह अलीम

आँख से दूर सही दिल से कहाँ जाएगा

उबैदुल्लाह अलीम

उदासी आज भी वैसी है जैसे पहले थी

उबैद सिद्दीक़ी

मैं पहले बे-बाक हुआ था जोश-ए-मोहब्बत में

उबैद सिद्दीक़ी

मैं बस ये कह रहा हूँ रस्म-ए-वफ़ा जहाँ में

उबैद सिद्दीक़ी

गर्मी सी ये गर्मी है

उबैद सिद्दीक़ी

वक़्त बदला सोच बदली बात बदली

उबैद हारिस

तह-ब-तह खुलती ही रहती है सदा

उबैद हारिस