Couplets Poetry (page 211)

वो लहू पी कर बड़े अंदाज़ से कहता है ये

ओवेस अहमद दौराँ

उन मकानों में भी इंसान ही रहते होंगे

ओवेस अहमद दौराँ

शायद किसी की याद का मौसम फिर आ गया

ओवेस अहमद दौराँ

सब मस्तियों में फेंको न पत्थर इधर उधर

ओवेस अहमद दौराँ

पैवंद की तरह नज़र आता है बद-नुमा

ओवेस अहमद दौराँ

कुछ दर्द के मारे हैं कुछ नाज़ के हैं पाले

ओवेस अहमद दौराँ

हम शाएर-ए-हयात हैं हम शाएर-ए-हयात!

ओवेस अहमद दौराँ

बे-दारों की दुनिया कभी लुटती नहीं 'दौराँ'

ओवेस अहमद दौराँ

बहती नहीं है मर्द की आँखों से जू-ए-अश्क

ओवेस अहमद दौराँ

ऐसा न हो ये रात कोई हश्र उठा दे

ओवेस अहमद दौराँ

फ़लक से मुझ को शिकवा है ज़मीं से मुझ को शिकवा है

उबैदुर्रहमान आज़मी

यही इक सानेहा कुछ कम नहीं है

ओबैदुर् रहमान

टूटता रहता है मुझ में ख़ुद मिरा अपना वजूद

ओबैदुर् रहमान

तामीर-ओ-तरक़्क़ी वाले हैं कहिए भी तो उन को क्या कहिए

ओबैदुर् रहमान

तलाशे जा रहे हैं अहद-ए-रफ़्ता

ओबैदुर् रहमान

सोहबत में जाहिलों की गुज़ारे थे चंद रोज़

ओबैदुर् रहमान

शोख़ी किसी में है न शरारत है अब 'उबैद'

ओबैदुर् रहमान

नज़र में दूर तलक रहगुज़र ज़रूरी है

ओबैदुर् रहमान

मेरे जज़्बात आँसुओं वाले

ओबैदुर् रहमान

कोई दिमाग़ से कोई शरीर से हारा

ओबैदुर् रहमान

जहाँ पहुँचने की ख़्वाहिश में उम्र बीत गई

ओबैदुर् रहमान

जब धूप सर पे थी तो अकेला था में 'उबैद'

ओबैदुर् रहमान

हमें तो ख़्वाब का इक शहर आँखों में बसाना था

ओबैदुर् रहमान

हमें हिजरत समझ में इतनी आई

ओबैदुर् रहमान

घटती बढ़ती रही परछाईं मिरी ख़ुद मुझ से

ओबैदुर् रहमान

दिखाओ सूरत-ए-ताज़ा बयान से पहले

ओबैदुर् रहमान

बच्चों को हम न एक खिलौना भी दे सके

ओबैदुर् रहमान

अपनी ही ज़ात के महबस में समाने से उठा

ओबैदुर् रहमान

आँगन आँगन ख़ून के छींटे चेहरा चेहरा बे-चेहरा

ओबैदुर् रहमान

ज़िंदगी इक ख़्वाब है ये ख़्वाब की ताबीर है

उबैदुल्लह सिद्दीक़ी