Couplets Poetry (page 214)
सदाएँ डूबती हैं जब
उबैद हारिस
नया चार दिन में पुराना हुआ
उबैद हारिस
खोलो न कोई ऐब किसी का भी यहाँ पर
उबैद हारिस
ख़ाली दीवार बुरी लगती है
उबैद हारिस
इन्हें आगे निकल जाने दो 'हारिस'
उबैद हारिस
हम किताबों में जिसे पाते हैं 'हारिस'
उबैद हारिस
अपना सच उस को सुनाने के लिए
उबैद हारिस
वो पता अपनी शाख़ से ज़रा जुदा हुआ ही था
नुसरत ग्वालियारी
वो गुलाबी बादलों में एक नीली झील सी
नुसरत ग्वालियारी
वो अंधी राह में बीनाइयाँ बिछाता रहा
नुसरत ग्वालियारी
उजाड़ तपती हुई राह में भटकने लगी
नुसरत ग्वालियारी
शफ़क़ सी फिर कोई उतरी है मुझ में
नुसरत ग्वालियारी
रात के लम्हात ख़ूनी दास्ताँ लिखते रहे
नुसरत ग्वालियारी
क़ानून जैसे खो चुका सदियों का ए'तिमाद
नुसरत ग्वालियारी
मिलना पड़ता है हमें ख़ुद से भी ग़ैरों की तरह
नुसरत ग्वालियारी
मिरे चराग़ की नन्ही सी लौ से ख़ाइफ़ है
नुसरत ग्वालियारी
मैं अजनबी हूँ मगर तुम कभी जो सोचोगे
नुसरत ग्वालियारी
कुछ नौ-जवान शहर से आए हैं लौट कर
नुसरत ग्वालियारी
कुछ एहतियात परिंदे भी रखना भूल गए
नुसरत ग्वालियारी
कितने ज़ेहनों को कर गया गुमराह
नुसरत ग्वालियारी
हुस्न उतना एक पैकर मैं सिमट सकता नहीं
नुसरत ग्वालियारी
हम तिरी तल्ख़ गुफ़्तुगू सुन कर
नुसरत ग्वालियारी
हर शख़्स अपनी अपनी जगह यूँ है मुतमइन
नुसरत ग्वालियारी
इक क़िस्म और ज़िंदा रहने की
नुसरत ग्वालियारी
दिलों के बीच की दीवार गिर भी सकती थी
नुसरत ग्वालियारी
ढूँडने वाले ग़लत-फ़हमी मैं थे
नुसरत ग्वालियारी
बोलते रहते हैं नुक़ूश उस के
नुसरत ग्वालियारी
भूल जाने का मुझे मशवरा देने वाले
नुसरत ग्वालियारी
बच्चा मजबूरियों को क्या जाने
नुसरत ग्वालियारी
ज़िंदगी क़रीब है किस क़दर जमाल से
नुशूर वाहिदी