Couplets Poetry (page 270)
ले गया काजल चुरा दुज़्द-ए-हिना
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ले चली है जो दिल तो ज़ुल्फ़-ए-दराज़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
लाख हम शेर कहें लाख इबारत लिक्खें
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
लैला चली थी हज के लिए जज़्ब-ए-इश्क़ से
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
लहरों का थरथराना क्यूँ-कर पसंद आवे
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
लग रही है ख़ाना-ए-दिल को हमारे आग हाए
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
लब बंद ही रक्खो, नहीं फिर और करेगा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्यूँकर न तुझे दौड़ के छाती से लगा लूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्यूँ शेर-ओ-शायरी को बुरा जानूँ 'मुसहफ़ी'
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्यूँ नीची नज़रें कर लीं मियाँ ये तो तू बता
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्या वो भी चाव-चूज़ के दिन थे कि जिन दिनों
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्या तअज्जुब है अगर फिर के हो अहया मेरा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्या रेख़्ता कम है 'मुसहफ़ी' का
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्या नाज़ुकी बदन की उस रश्क-ए-गुल के कहिए
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्या क्या बदन-ए-साफ़ नज़र आते हैं हम को
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्या किया उस का किसू ने बाग़ से जाती रही
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्या काम किया तुम ने थी ये भी अदा कोई
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्या जानिए किस किस को मैं याँ दी है अज़िय्यत
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्या जानिए चमन में क्या ताज़ा गुल खिला हो
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्या जाने क्या करेगा ये दीदार देखना
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्या बैठना क्या उठना क्या बोलना क्या हँसना
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
क्या अदा से आवे है दीवाना कर के सैर-ए-बाग़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
कुश्ता-ए-रंग-ए-हिना हूँ मैं ओजब इस का क्या
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
कुफ़्र फैला है यहाँ तक कि ज़माने में कोई
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
कुफ़्र और दीं में तग़ायर नहीं गर देखिए ख़ूब
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
कुछ टूटे फटे सीने को साथ अपने सफ़र में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
कुछ तो मिलता है मज़ा सा शब-ए-तन्हाई में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
कुछ शेर-ओ-शायरी से नहीं मुझ को फ़ाएदा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
कुछ इस क़दर नहीं सफ़र-ए-हस्ती-ओ-अदम
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
कूचा-ए-ज़ुल्फ़ में फिरता हूँ भटकता कब का
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी