Couplets Poetry (page 450)
बड़े अरमान से निकला था शॉपिंग के लिए घर से
बेदिल जौनपूरी
ये दिल जो मुज़्तरिब रहता बहुत है
बेदिल हैदरी
रात को रोज़ डूब जाता है
बेदिल हैदरी
मेरे अंदर का पाँचवाँ मौसम
बेदिल हैदरी
ख़ोल चेहरों पे चढ़ाने नहीं आते हम को
बेदिल हैदरी
कहीं इंतिहा की मलामतें कहीं पत्थरों से अटी छतें
बेदिल हैदरी
जितना हंगामा ज़ियादा होगा
बेदिल हैदरी
हम तुम में कल दूरी भी हो सकती है
बेदिल हैदरी
हो गया चर्ख़-ए-सितमगर का कलेजा ठंडा
बेदिल हैदरी
गर्मी लगी तो ख़ुद से अलग हो के सो गए
बेदिल हैदरी
भूक चेहरों पे लिए चाँद से प्यारे बच्चे
बेदिल हैदरी
वो ले गया है मिरी आँख अपनी बस्ती में
बेदार सरमदी
वो क़ुलक़ुल-ए-मीना में चर्चे मिरी तौबा के
बेदम शाह वारसी
तुम जो चाहो तो मिरे दर्द का दरमाँ हो जाए
बेदम शाह वारसी
तौर मजनूँ की निगाहों के बताते हैं हमें
बेदम शाह वारसी
सब ने ग़ुर्बत में मुझ को छोड़ दिया
बेदम शाह वारसी
मिरे नाशाद रहने से अगर तुझ को मसर्रत है
बेदम शाह वारसी
मिरे दर्द-ए-निहाँ का हाल मोहताज-ए-बयाँ क्यूँ हो
बेदम शाह वारसी
कश्तियाँ सब की किनारे पे पहुँच जाती हैं
बेदम शाह वारसी
कहाँ ईमान किस का कुफ़्र और दैर-ओ-हरम कैसे
बेदम शाह वारसी
जो सुनता हूँ सुनता हूँ मैं अपनी ख़मोशी से
बेदम शाह वारसी
जिस की इस आलम-ए-सूरत में है रंग-आमेज़ी
बेदम शाह वारसी
हमारी ज़िंदगी तो मुख़्तसर सी इक कहानी थी
बेदम शाह वारसी
देने वाले तुझे देना है तो इतना दे दे
बेदम शाह वारसी
बेदम ये मोहब्बत है या कोई मुसीबत है
बेदम शाह वारसी
बरहमन मुझ को बनाना न मुसलमाँ करना
बेदम शाह वारसी
अपना तो ये मज़हब है काबा हो कि बुत-ख़ाना
बेदम शाह वारसी
ऐ जुनूँ क्यूँ लिए जाता है बयाबाँ में मुझे
बेदम शाह वारसी
अब आदमी कुछ और हमारी नज़र में है
बेदम शाह वारसी
ये तासीर मोहब्बत है कि टपका
बयान मेरठी