Couplets Poetry (page 449)
ज़मीन प्यासी है बूढ़ा गगन भी भूका है
बेकल उत्साही
यूँ तो कई किताबें पढ़ीं ज़ेहन में मगर
बेकल उत्साही
वो थे जवाब के साहिल पे मुंतज़िर लेकिन
बेकल उत्साही
वो मेरे क़त्ल का मुल्ज़िम है लोग कहते हैं
बेकल उत्साही
उस का जवाब एक ही लम्हे में ख़त्म था
बेकल उत्साही
उलझ रहे हैं बहुत लोग मेरी शोहरत से
बेकल उत्साही
न जाने कौन सा नश्शा है उन पे छाया हुआ
बेकल उत्साही
लोग तो जा के समुंदर को जला आए हैं
बेकल उत्साही
किवाड़ बंद करो तीरा-बख़्तो सो जाओ
बेकल उत्साही
ख़ुदा करे मिरा मुंसिफ़ सज़ा सुनाने पर
बेकल उत्साही
इश्क़-विश्क़ ये चाहत-वाहत मन का भुलावा फिर मन भी अपना क्या
बेकल उत्साही
हम भटकते रहे अंधेरे में
बेकल उत्साही
हवा-ए-इश्क़ ने भी गुल खिलाए हैं क्या क्या
बेकल उत्साही
हर एक लहज़ा मिरी धड़कनों में चुभती थी
बेकल उत्साही
फ़र्श ता अर्श कोई नाम-ओ-निशाँ मिल न सका
बेकल उत्साही
फ़रिश्ते देख रहे हैं ज़मीन ओ चर्ख़ का रब्त
बेकल उत्साही
दौर-ए-हाज़िर की बज़्म में 'बेकल'
बेकल उत्साही
चाँदी के घरोंदों की जब बात चली होगी
बेकल उत्साही
बीच सड़क इक लाश पड़ी थी और ये लिक्खा था
बेकल उत्साही
बदन की आँच से सँवला गए हैं पैराहन
बेकल उत्साही
अज़्म-ए-मोहकम हो तो होती हैं बलाएँ पसपा
बेकल उत्साही
ज़िंदा हूँ इस तरह कि ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं
बहज़ाद लखनवी
मुझे तो होश न था उन की बज़्म में लेकिन
बहज़ाद लखनवी
मैं ढूँढ रहा हूँ मिरी वो शम्अ कहाँ है
बहज़ाद लखनवी
इश्क़ का एजाज़ सज्दों में निहाँ रखता हूँ मैं
बहज़ाद लखनवी
हम भी ख़ुद को तबाह कर लेते
बहज़ाद लखनवी
ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए
बहज़ाद लखनवी
ऐ दिल की ख़लिश गर यूँही सही चलता तो हूँ उन की महफ़िल में
बहज़ाद लखनवी
आता है जो तूफ़ाँ आने दे कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है
बहज़ाद लखनवी
कुछ बे-अदबी और शब-ए-वस्ल नहीं की
बेगम लखनवी