Couplets Poetry (page 452)
'बासिर' तुम्हें यहाँ का अभी तजरबा नहीं
बासिर सुल्तान काज़मी
बढ़ गई तुझ से मिल के तन्हाई
बासिर सुल्तान काज़मी
अपनी बातों के ज़माने तो हवा-बुर्द हुए
बासिर सुल्तान काज़मी
अब दिल को समझाए कौन
बासिर सुल्तान काज़मी
ज़ोर से साँस जो लेता हूँ तो अक्सर शब-ए-ग़म
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
ये उन का खेल तो देखो कि एक काग़ज़ पर
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
ये छेड़ क्या है ये क्या मुझ से दिल-लगी है कोई
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
वो अपने मतलब की कह रहे हैं ज़बान पर गो है बात मेरी
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
शाम भी है सुब्ह भी है और दिन भी रात भी
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
रिहाई जीते जी मुमकिन नहीं है
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
मिरा दिल भी तिलिस्मी है ख़ज़ाना
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
कहते हैं अर्ज़-ए-वस्ल पर वो कहो
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
कभी दर पर कभी है रस्ते में
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
बंधन सा इक बँधा था रग-ओ-पय से जिस्म में
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
अहद के साथ ये भी हो इरशाद
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
तेरे नाम का तारा जाने कब दिखाई दे
बशीर सैफ़ी
ख़ुद अपनी ही गहराई में
बशीर सैफ़ी
गूँजूँगा तेरे ज़ेहन के गुम्बद में रात-दिन
बशीर सैफ़ी
तज़्किरे में तिरे इक नाम को यूँ जोड़ दिया
बशीर फ़ारूक़ी
पहले हम ने घर बना कर फ़ासले पैदा किए
बशीर फ़ारूक़ी
हम तेरे पास आ के परेशान हैं बहुत
बशीर फ़ारूक़ी
चले भी आओ कि ये डूबता हुआ सूरज
बशीर फ़ारूक़ी
अजब सी आग थी जलता रहा बदन सारा
बशीर फ़ारूक़ी
आगही कर्ब वफ़ा सब्र तमन्ना एहसास
बशीर फ़ारूक़ी
मिरी नमाज़ मिरी बंदगी मिरा ईमाँ
बशीर फ़ारूक़
ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
बशीर बद्र
ये ज़ाफ़रानी पुलओवर उसी का हिस्सा है
बशीर बद्र
ये शबनमी लहजा है आहिस्ता ग़ज़ल पढ़ना
बशीर बद्र
ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
बशीर बद्र