Couplets Poetry (page 506)

ज़मीन पाँव के नीचे से सरकी जाती है

अरशद अली ख़ान क़लक़

यूँ रूह थी अदम में मिरी बहर-ए-तन उदास

अरशद अली ख़ान क़लक़

यूँ राही-ए-अ'दम हुई बा-वस्फ़-ए-उज़्र-ए-लंग

अरशद अली ख़ान क़लक़

यार की फ़र्त-ए-नज़ाकत का हूँ मैं शुक्र-गुज़ार

अरशद अली ख़ान क़लक़

यही इंसाफ़ तिरे अहद में है ऐ शह-ए-हुस्न

अरशद अली ख़ान क़लक़

याद दिलवाइए उन को जो कभी वादा-ए-वस्ल

अरशद अली ख़ान क़लक़

वो रिंद हूँ कि मुझे हथकड़ी से बैअत है

अरशद अली ख़ान क़लक़

वो एक रात तो मुझ से अलग न सोएगा

अरशद अली ख़ान क़लक़

उन वाइ'ज़ों की ज़िद से हम अब की बहार में

अरशद अली ख़ान क़लक़

उम्र तो अपनी हुई सब बुत-परस्ती में बसर

अरशद अली ख़ान क़लक़

तिलाई रंग जानाँ का अगर मज़मून लिखूँ ख़त में

अरशद अली ख़ान क़लक़

तिरे होंठों से शर्मा कर पसीने में हुआ ये तर

अरशद अली ख़ान क़लक़

सितम वो तुम ने किए भूले हम गिला दिल का

अरशद अली ख़ान क़लक़

सिंदूर उस की माँग में देता है यूँ बहार

अरशद अली ख़ान क़लक़

सैद ख़ाइफ़ वो हों इस सैद-गह-ए-आ'लम में

अरशद अली ख़ान क़लक़

रुख़ तह-ए-ज़ुल्फ़ है और ज़ुल्फ़ परेशाँ सर पर

अरशद अली ख़ान क़लक़

रस्ते में उन को छेड़ के खाते हैं गालियाँ

अरशद अली ख़ान क़लक़

राह-ए-हक़ में खेल जाँ-बाज़ी है ओ ज़ाहिर-परस्त

अरशद अली ख़ान क़लक़

'क़लक़' ग़ज़लें पढ़ेंगे जा-ए-कुरआँ सब पस-ए-मुर्दन

अरशद अली ख़ान क़लक़

पूछा सबा से उस ने पता कू-ए-यार का

अरशद अली ख़ान क़लक़

फिर मुझ से इस तरह की न कीजेगा दिल-लगी

अरशद अली ख़ान क़लक़

फिर गया आँखों में उस कान के मोती का ख़याल

अरशद अली ख़ान क़लक़

फँस गया है दाम-ए-काकुल में बुतान-ए-हिन्द के

अरशद अली ख़ान क़लक़

नया मज़मून लाना काटना कोह-ओ-जबल का है

अरशद अली ख़ान क़लक़

मुझ से उन आँखों को वहशत है मगर मुझ को है इश्क़

अरशद अली ख़ान क़लक़

मुबारक दैर-ओ-का'बा हों 'क़लक़' शैख़-ओ-बरहमन को

अरशद अली ख़ान क़लक़

मिसाल-ए-आइना हम जब से हैरती हैं तिरे

अरशद अली ख़ान क़लक़

मंज़िल है अपनी अपनी 'क़लक़' अपनी अपनी गोर

अरशद अली ख़ान क़लक़

मैं वो मय-कश हूँ मिली है मुझ को घुट्टी में शराब

अरशद अली ख़ान क़लक़

मय जो दी ग़ैर को साक़ी ने कराहत देखो

अरशद अली ख़ान क़लक़