Couplets Poetry (page 507)
लाग़र ऐसा वहशत-ए-इश्क़-ए-लब-ए-शीरीं में हूँ
अरशद अली ख़ान क़लक़
क्या कोई दिल लगा के कहे शे'र ऐ 'क़लक़'
अरशद अली ख़ान क़लक़
कुफ्र-ओ-इस्लाम के झगड़ों से छुड़ाया सद-शुक्र
अरशद अली ख़ान क़लक़
कुछ ख़बर देता नहीं उस की दिल-ए-आगह मुझे
अरशद अली ख़ान क़लक़
कोताह उम्र हो गई और ये न कम हुई
अरशद अली ख़ान क़लक़
ख़ुश-क़दों से कभी आलम न रहेगा ख़ाली
अरशद अली ख़ान क़लक़
खुलने से एक जिस्म के सौ ऐब ढक गए
अरशद अली ख़ान क़लक़
ख़ुदा-हाफ़िज़ है अब ऐ ज़ाहिदो इस्लाम-ए-आशिक़ का
अरशद अली ख़ान क़लक़
ख़त में लिक्खी है हक़ीक़त दश्त-गर्दी की अगर
अरशद अली ख़ान क़लक़
ख़रीदारी-ए-जिंस-ए-हुस्न पर रग़बत दिलाता है
अरशद अली ख़ान क़लक़
ख़फ़ा हो गालियाँ दो चाहे आने दो न आने दो
अरशद अली ख़ान क़लक़
करो तुम मुझ से बातें और मैं बातें करूँ तुम से
अरशद अली ख़ान क़लक़
करेंगे हम से वो क्यूँकर निबाह देखते हैं
अरशद अली ख़ान क़लक़
काबे से खींच लाया हम को सनम-कदे में
अरशद अली ख़ान क़लक़
जमे क्या पाँव मेरे ख़ाना-ए-दिल में क़नाअ'त का
अरशद अली ख़ान क़लक़
जब हुआ गर्म-ए-कलाम-ए-मुख़्तसर महका दिया
अरशद अली ख़ान क़लक़
हम उन से और वो हम से दम-ए-सुल्ह थे ख़जिल
अरशद अली ख़ान क़लक़
हम तो न घर में आप के दम-भर ठहरने आएँ
अरशद अली ख़ान क़लक़
हुआ मैं रिंद-मशरब ख़ाक मर कर इस तमन्ना में
अरशद अली ख़ान क़लक़
हिम्मत का ज़ाहिदों की सरासर क़ुसूर था
अरशद अली ख़ान क़लक़
हज़रत-ए-इश्क़ ने दोनों को किया ख़ाना-ख़राब
अरशद अली ख़ान क़लक़
गुल-गूँ तिरी गली रहे आशिक़ के ख़ून से
अरशद अली ख़ान क़लक़
गुलगश्त-ए-बाग़ को जो गया वो गुल-ए-फ़रंग
अरशद अली ख़ान क़लक़
घाट पर तलवार के नहलाईयो मय्यत मिरी
अरशद अली ख़ान क़लक़
गर्दिश में साथ उन आँखों का कोई न दे सका
अरशद अली ख़ान क़लक़
दिल ख़स्ता हो तो लुत्फ़ उठे कुछ अपनी ग़ज़ल का
अरशद अली ख़ान क़लक़
दस्त-ए-जुनूँ ने फाड़ के फेंका इधर-उधर
अरशद अली ख़ान क़लक़
छेड़ा अगर मिरे दिल-ए-नालाँ को आप ने
अरशद अली ख़ान क़लक़
चला है छोड़ के तन्हा किधर तसव्वुर-ए-यार
अरशद अली ख़ान क़लक़
बुत-परस्ती में भी भूली न मुझे याद-ए-ख़ुदा
अरशद अली ख़ान क़लक़