Couplets Poetry (page 509)
हल्क़ा-ए-दिल से न निकलो कि सर-ए-कूचा-ए-ख़ाक
अरशद अब्दुल हमीद
ग़म-ए-जहान ओ ग़म-ए-यार दो किनारे हैं
अरशद अब्दुल हमीद
दिल को मालूम है क्या बात बतानी है उसे
अरशद अब्दुल हमीद
ज़माने भर ने कहा 'अर्श' जो, ख़ुशी से सहा
अर्श सिद्दीक़ी
वो अयादत को तो आया था मगर जाते हुए
अर्श सिद्दीक़ी
उठती तो है सौ बार पे मुझ तक नहीं आती
अर्श सिद्दीक़ी
मैं पैरवी-ए-अहल-ए-सियासत नहीं करता
अर्श सिद्दीक़ी
हम ने चाहा था तेरी चाल चलें
अर्श सिद्दीक़ी
हम कि मायूस नहीं हैं उन्हें पा ही लेंगे
अर्श सिद्दीक़ी
हाँ समुंदर में उतर लेकिन उभरने की भी सोच
अर्श सिद्दीक़ी
इक तेरी बे-रुख़ी से ज़माना ख़फ़ा हुआ
अर्श सिद्दीक़ी
एक लम्हे को तुम मिले थे मगर
अर्श सिद्दीक़ी
देख रह जाए न तू ख़्वाहिश के गुम्बद में असीर
अर्श सिद्दीक़ी
बस यूँही तन्हा रहूँगा इस सफ़र में उम्र भर
अर्श सिद्दीक़ी
वो सहरा जिस में कट जाते हैं दिन याद-ए-बहाराँ से
अर्श मलसियानी
तिरी दुनिया को ऐ वाइज़ मिरी दुनिया से क्या निस्बत
अर्श मलसियानी
तौबा तौबा ये बला-ख़ेज़ जवानी तौबा
अर्श मलसियानी
साक़ी मिरी ख़मोश-मिज़ाजी की लाज रख
अर्श मलसियानी
पी लेंगे ज़रा शैख़ तो कुछ गर्म रहेंगे
अर्श मलसियानी
न नशेमन है न है शाख़-ए-नशेमन बाक़ी
अर्श मलसियानी
मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है
अर्श मलसियानी
मौत ही इंसान की दुश्मन नहीं
अर्श मलसियानी
ख़ुश्क बातों में कहाँ है शैख़ कैफ़-ए-ज़िंदगी
अर्श मलसियानी
जितनी वो मिरे हाल पे करते हैं जफ़ाएँ
अर्श मलसियानी
इस इंतिहा-ए-तर्क-ए-मोहब्बत के बावजूद
अर्श मलसियानी
हुस्न हर हाल में है हुस्न परागंदा नक़ाब
अर्श मलसियानी
है देखने वालों को सँभलने का इशारा
अर्श मलसियानी
है देखने वालों को सँभलने का इशारा
अर्श मलसियानी
फ़रिश्ते को मिरे नाले यूँही बदनाम करते हैं
अर्श मलसियानी
इक रौशनी सी दिल में थी वो भी नहीं रही
अर्श मलसियानी