Couplets Poetry (page 569)

दिल गया था तो ये आँखें भी कोई ले जाता

अहमद नदीम क़ासमी

भरी दुनिया में फ़क़त मुझ से निगाहें न चुरा

अहमद नदीम क़ासमी

अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था

अहमद नदीम क़ासमी

अजब तज़ाद में काटा है ज़िंदगी का सफ़र

अहमद नदीम क़ासमी

आख़िर दुआ करें भी तो किस मुद्दआ के साथ

अहमद नदीम क़ासमी

आज की रात भी तन्हा ही कटी

अहमद नदीम क़ासमी

आग़ोश में महकोगे दिखाई नहीं दोगे

अहमद नदीम क़ासमी

ये वो मौसम है जिस में कोई पत्ता भी नहीं हिलता

अहमद मुश्ताक़

ये तन्हा रात ये गहरी फ़ज़ाएँ

अहमद मुश्ताक़

ये पानी ख़ामुशी से बह रहा है

अहमद मुश्ताक़

यार सब जम्अ हुए रात की ख़ामोशी में

अहमद मुश्ताक़

यही दुनिया थी मगर आज भी यूँ लगता है

अहमद मुश्ताक़

वो वक़्त भी आता है जब आँखों में हमारी

अहमद मुश्ताक़

वो जो रात मुझ को बड़े अदब से सलाम कर के चला गया

अहमद मुश्ताक़

वहाँ सलाम को आती है नंगे पाँव बहार

अहमद मुश्ताक़

उम्र भर दुख सहते सहते आख़िर इतना तो हुआ

अहमद मुश्ताक़

तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ

अहमद मुश्ताक़

तू ने ही तो चाहा था कि मिलता रहूँ तुझ से

अहमद मुश्ताक़

तू अगर पास नहीं है कहीं मौजूद तो है

अहमद मुश्ताक़

तन्हाई में करनी तो है इक बात किसी से

अहमद मुश्ताक़

तमाशा-गाह-ए-जहाँ में मजाल-ए-दीद किसे

अहमद मुश्ताक़

संग उठाना तो बड़ी बात है अब शहर के लोग

अहमद मुश्ताक़

रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए

अहमद मुश्ताक़

रोने लगता हूँ मोहब्बत में तो कहता है कोई

अहमद मुश्ताक़

पता अब तक नहीं बदला हमारा

अहमद मुश्ताक़

पानी में अक्स और किसी आसमाँ का है

अहमद मुश्ताक़

नींदों में फिर रहा हूँ उसे ढूँढता हुआ

अहमद मुश्ताक़

नए दीवानों को देखें तो ख़ुशी होती है

अहमद मुश्ताक़

मुझे मालूम है अहल-ए-वफ़ा पर क्या गुज़रती है

अहमद मुश्ताक़

मोहब्बत मर गई 'मुश्ताक़' लेकिन तुम न मानोगे

अहमद मुश्ताक़