Couplets Poetry (page 570)

मिलने की ये कौन घड़ी थी

अहमद मुश्ताक़

मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है

अहमद मुश्ताक़

मैं ने कहा कि देख ये मैं ये हवा ये रात

अहमद मुश्ताक़

मैं बहुत ख़ुश था कड़ी धूप के सन्नाटे में

अहमद मुश्ताक़

कोई तस्वीर मुकम्मल नहीं होने पाती

अहमद मुश्ताक़

किसी जानिब नहीं खुलते दरीचे

अहमद मुश्ताक़

खोया है कुछ ज़रूर जो उस की तलाश में

अहमद मुश्ताक़

ख़ैर बदनाम तो पहले भी बहुत थे लेकिन

अहमद मुश्ताक़

कैसे आ सकती है ऐसी दिल-नशीं दुनिया को मौत

अहमद मुश्ताक़

कई चाँद थे सर-ए-आसमाँ कि चमक चमक के पलट गए

अहमद मुश्ताक़

जो मुक़द्दर था उसे तो रोकना बस में न था

अहमद मुश्ताक़

जिस की साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे

अहमद मुश्ताक़

जैसे पौ फट रही हो जंगल में

अहमद मुश्ताक़

जहान-ए-इश्क़ से हम सरसरी नहीं गुज़रे

अहमद मुश्ताक़

जहाँ डाले थे उस ने धूप में कपड़े सुखाने को

अहमद मुश्ताक़

जब शाम उतरती है क्या दिल पे गुज़रती है

अहमद मुश्ताक़

जाने किस दम निकल आए तिरे रुख़्सार की धूप

अहमद मुश्ताक़

इश्क़ में कौन बता सकता है

अहमद मुश्ताक़

इस माअ'रके में इश्क़ बेचारा करेगा क्या

अहमद मुश्ताक़

हम उन को सोच में गुम देख कर वापस चले आए

अहमद मुश्ताक़

हम अपनी धूप में बैठे हैं 'मुश्ताक़'

अहमद मुश्ताक़

होती है शाम आँख से आँसू रवाँ हुए

अहमद मुश्ताक़

हिज्र इक वक़्फ़ा-ए-बेदार है दो नींदों में

अहमद मुश्ताक़

हमारा क्या है जो होता है जी उदास बहुत

अहमद मुश्ताक़

गुज़रे हज़ार बादल पलकों के साए साए

अहमद मुश्ताक़

गुम रहा हूँ तिरे ख़यालों में

अहमद मुश्ताक़

इक ज़माना था कि सब एक जगह रहते थे

अहमद मुश्ताक़

इक रात चाँदनी मिरे बिस्तर पे आई थी

अहमद मुश्ताक़

एक लम्हे में बिखर जाता है ताना-बाना

अहमद मुश्ताक़

दुख के सफ़र पे दिल को रवाना तो कर दिया

अहमद मुश्ताक़