Couplets Poetry (page 572)

गुम-शुदा मैं हूँ तो हर सम्त भी गुम है मुझ में

अहमद महफ़ूज़

देखना ही जो शर्त ठहरी है

अहमद महफ़ूज़

दामन को ज़रा झटक तो देखो

अहमद महफ़ूज़

चढ़ा हुआ था वो दरिया अगर हमारे लिए

अहमद महफ़ूज़

बिछड़ के ख़ाक हुए हम तो क्या ज़रा देखो

अहमद महफ़ूज़

अब इस मकाँ में नया कोई दर नहीं करना

अहमद महफ़ूज़

तुम्हारे नाम पे मैं जल-बुझा तो इल्म हुआ

अहमद लतीफ़

क़दम कुछ ऐसा उठा आख़िरी क़दम कि 'लतीफ़'

अहमद लतीफ़

ये भी तिरी शिकस्त नहीं है तो और क्या

अहमद ख़याल

ये भी एजाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी

अहमद ख़याल

वो ज़हर है फ़ज़ाओं में कि आदमी की बात क्या

अहमद ख़याल

वो सर उठाए यहाँ से पलट गया 'अहमद'

अहमद ख़याल

वो दे रहा था तलब से सिवा सभी को 'ख़याल'

अहमद ख़याल

तुम्हारी जीत में पिन्हाँ है मेरी जीत कहीं

अहमद ख़याल

तू जो ये जान हथेली पे लिए फिरता है

अहमद ख़याल

सुकूत तोड़ने का एहतिमाम करना चाहिए

अहमद ख़याल

मेरे कश्कोल में डाल और ज़रा इज्ज़ कि मैं

अहमद ख़याल

मैं था सदियों के सफ़र में 'अहमद'

अहमद ख़याल

महकते फूल सितारे दमकता चाँद धनक

अहमद ख़याल

कोई तो दश्त समुंदर में ढल गया आख़िर

अहमद ख़याल

कोई हैरत है न इस बात का रोना है हमें

अहमद ख़याल

किसी दरवेश के हुजरे से अभी आया हूँ

अहमद ख़याल

हवा के हाथ पे छाले हैं आज तक मौजूद

अहमद ख़याल

दिल किसी बज़्म में जाते ही मचलता है 'ख़याल'

अहमद ख़याल

दश्त में वादी-ए-शादाब को छू कर आया

अहमद ख़याल

बस चंद लम्हे पेश-तर वो पाँव धो के पल्टा है

अहमद ख़याल

ऐन मुमकिन है कि बीनाई मुझे धोका दे

अहमद ख़याल

तू ने ऐ इश्क़ ये सोचा कि तिरा क्या होगा

अहमद कामरान

रास आएगी मोहब्बत उस को

अहमद कामरान

पाँव बाँधे हैं वफ़ा से जब ने

अहमद कामरान