Couplets Poetry (page 573)

मुझ पे तस्वीर लगा दी गई है

अहमद कामरान

मिरी वफ़ा है मिरे मुँह पे हाथ रक्खे हुए

अहमद कामरान

कुर्रा-ए-हिज्र से होना है नुमूदार मुझे

अहमद कामरान

इक पल का तवक़्क़ुफ़ भी गिराँ-बार है तुझ पर

अहमद कामरान

चंद पेड़ों को ही मजनूँ की दुआ होती है

अहमद कामरान

चाहिए है मुझे इंकार-ए-मोहब्बत मिरे दोस्त

अहमद कामरान

वो अपने हुस्न की ख़ैरात देने वाले हैं

अहमद कमाल परवाज़ी

तुम्हारे वस्ल का जिस दिन कोई इम्कान होता है

अहमद कमाल परवाज़ी

तुम मेरे साथ हो ये सच तो नहीं है लेकिन

अहमद कमाल परवाज़ी

तुझ से बिछड़ूँ तो तिरी ज़ात का हिस्सा हो जाऊँ

अहमद कमाल परवाज़ी

तुझ से बिछड़ूँ तो तिरी ज़ात का हिस्सा हो जाऊँ

अहमद कमाल परवाज़ी

तन्हाई से बचाव की सूरत नहीं करूँ

अहमद कमाल परवाज़ी

रफ़ाक़तों का तवाज़ुन अगर बिगड़ जाए

अहमद कमाल परवाज़ी

न जाने क्या ख़राबी आ गई है मेरे लहजे में

अहमद कमाल परवाज़ी

मुझ को मालूम है महबूब-परस्ती का अज़ाब

अहमद कमाल परवाज़ी

मिरी आदत मुझे पागल नहीं होने देती

अहमद कमाल परवाज़ी

मैं ने इस शहर में वो ठोकरें खाई हैं कि अब

अहमद कमाल परवाज़ी

मैं क़सीदा तिरा लिक्खूँ तो कोई बात नहीं

अहमद कमाल परवाज़ी

मैं इस लिए भी तिरे फ़न की क़द्र करता हूँ

अहमद कमाल परवाज़ी

ख़ुदाया यूँ भी हो कि उस के हाथों क़त्ल हो जाऊँ

अहमद कमाल परवाज़ी

जो खो गया है कहीं ज़िंदगी के मेले में

अहमद कमाल परवाज़ी

इस क़दर आप के बदले हुए तेवर हैं कि मैं

अहमद कमाल परवाज़ी

एक ही तीर है तरकश में तो उजलत न करो

अहमद कमाल परवाज़ी

अगर कट-फट गया था मेरा दामन

अहमद कमाल परवाज़ी

आग तो चारों ही जानिब थी पर अच्छा ये है

अहमद कमाल परवाज़ी

ये क्या चीज़ तामीर करने चले हो

अहमद जावेद

ये एक लम्हे की दूरी बहुत है मेरे लिए

अहमद जावेद

यही दिल जो इक बूँद है बहर-ए-ग़म की

अहमद जावेद

उस की आँखों के वस्फ़ क्या लिक्खूँ

अहमद जावेद

तुलू-ए-साअत-ए-शब-ख़ूँ है और मेरा दिल

अहमद जावेद