Couplets Poetry (page 571)
दिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन
अहमद मुश्ताक़
दिल भर आया काग़ज़-ए-ख़ाली की सूरत देख कर
अहमद मुश्ताक़
धुएँ से आसमाँ का रंग मैला होता जाता है
अहमद मुश्ताक़
चुप कहीं और लिए फिरती थी बातें कहीं और
अहमद मुश्ताक़
छत से कुछ क़हक़हे अभी तक
अहमद मुश्ताक़
चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले
अहमद मुश्ताक़
भूल गई वो शक्ल भी आख़िर
अहमद मुश्ताक़
बला की चमक उस के चेहरे पे थी
अहमद मुश्ताक़
बहुत उदास हो तुम और मैं भी बैठा हूँ
अहमद मुश्ताक़
बहता आँसू एक झलक में कितने रूप दिखाएगा
अहमद मुश्ताक़
अरे क्यूँ डर रहे हो जंगल से
अहमद मुश्ताक़
अहल-ए-हवस तो ख़ैर हवस में हुए ज़लील
अहमद मुश्ताक़
अब उस की शक्ल भी मुश्किल से याद आती है
अहमद मुश्ताक़
अब शुग़्ल है यही दिल-ए-ईज़ा-पसंद का
अहमद मुश्ताक़
ज़ख़्मों को अश्क-ए-ख़ूँ से सैराब कर रहा हूँ
अहमद महफ़ूज़
ये शुग़्ल-ए-ज़बानी भी बे-सर्फ़ा नहीं आख़िर
अहमद महफ़ूज़
ये कैसा ख़ूँ है कि बह रहा है न जम रहा है
अहमद महफ़ूज़
ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास
अहमद महफ़ूज़
यहीं गुम हुआ था कई बार मैं
अहमद महफ़ूज़
उसे भुलाया तो अपना ख़याल भी न रहा
अहमद महफ़ूज़
उस से मिलना और बिछड़ना देर तक फिर सोचना
अहमद महफ़ूज़
तारीकी के रात अज़ाब ही क्या कम थे
अहमद महफ़ूज़
सुना है शहर का नक़्शा बदल गया 'महफ़ूज़'
अहमद महफ़ूज़
शोर हरीम-ए-ज़ात में आख़िर उट्ठा क्यूँ
अहमद महफ़ूज़
नहीं आसमाँ तिरी चाल में नहीं आऊँगा
अहमद महफ़ूज़
मिलने दिया न उस से हमें जिस ख़याल ने
अहमद महफ़ूज़
मिरी इब्तिदा मिरी इंतिहा कहीं और है
अहमद महफ़ूज़
किसी से क्या कहें सुनें अगर ग़ुबार हो गए
अहमद महफ़ूज़
कहाँ किसी को थी फ़ुर्सत फ़ुज़ूल बातों की
अहमद महफ़ूज़
हम को आवारगी किस दश्त में लाई है कि अब
अहमद महफ़ूज़