Couplets Poetry (page 567)
मैं नुक्ता-चीं नहीं हूँ मगर ये बताइए
अहमद रियाज़
कुछ इस तरह से लुटी है मता-ए-दीदा-ओ-दिल
अहमद रियाज़
ग़म-ए-हबीब ग़म-ए-ज़िंदगी ग़म-ए-दौराँ
अहमद रियाज़
फ़र्त-ए-ग़म-ए-हवादिस-ए-दौराँ के बावजूद
अहमद रियाज़
ज़िंदगी के वो किसी मोड़ पे गाहे गाहे
अहमद राही
वो दास्ताँ जो तिरी दिल-कशी ने छेड़ी थी
अहमद राही
वक़्त की क़ब्र में उल्फ़त का भरम रखने को
अहमद राही
क़द ओ गेसू लब-ओ-रुख़्सार के अफ़्साने चले
अहमद राही
मिरे हबीब मिरी मुस्कुराहटों पे न जा
अहमद राही
मैं तो मस्जिद से चला था किसी काबा की तरफ़
अहमद राही
मैं सोचता हूँ ज़माने का हाल क्या होगा
अहमद राही
ख़ुश्क ख़ुश्क सी पलकें और सूख जाती हैं
अहमद राही
कहीं ये अपनी मोहब्बत की इंतिहा तो नहीं
अहमद राही
जिस तरफ़ जाएँ जहाँ जाएँ भरी दुनिया में
अहमद राही
हर एक बात के यूँ तो दिए जवाब उस ने
अहमद राही
दूर तेरी महफ़िल से रात दिन सुलगता हूँ
अहमद राही
दिल से दिल नज़रों से नज़रों के उलझने का समाँ
अहमद राही
दिल के सुनसान जज़ीरों की ख़बर लाएगा
अहमद राही
दर्द की बात किसी हँसती हुई महफ़िल में
अहमद राही
अब न काबा की तमन्ना न किसी बुत की हवस
अहमद राही
अब इस के तसव्वुर से भी झुकने लगीं आँखें
अहमद राही
ज़िंदगी शम्अ की मानिंद जलाता हूँ 'नदीम'
अहमद नदीम क़ासमी
यकसाँ हैं फ़िराक़-ए-वस्ल दोनों
अहमद नदीम क़ासमी
उस वक़्त का हिसाब क्या दूँ
अहमद नदीम क़ासमी
उन का आना हश्र से कुछ कम न था
अहमद नदीम क़ासमी
उम्र भर संग-ज़नी करते रहे अहल-ए-वतन
अहमद नदीम क़ासमी
तुम मिरे इरादों के डोलते सितारों को
अहमद नदीम क़ासमी
तुझ से किस तरह मैं इज़हार-ए-तमन्ना करता
अहमद नदीम क़ासमी
तू ने यूँ देखा है जैसे कभी देखा ही न था
अहमद नदीम क़ासमी
सुब्ह होते ही निकल आते हैं बाज़ार में लोग
अहमद नदीम क़ासमी