Couplets Poetry (page 565)

बस उस की पहचान यही है

अहमद शनास

बहुत छोटा सफ़र था ज़िंदगी का

अहमद शनास

बाहर इंसानों से नफ़रत है लेकिन

अहमद शनास

बग़ैर-ए-जिस्म भी है जिस्म का एहसास ज़िंदा

अहमद शनास

अल्लाह वाला एक क़बीला मेरी निस्बत

अहमद शनास

तुझ से भी कब हुई तदबीर मिरी वहशत की

अहमद शहरयार

तू मौजूद है मैं मादूम हूँ इस का मतलब ये है

अहमद शहरयार

समाई किस तरह मेरी आँखों की पुतलियों में

अहमद शहरयार

रातों को जागते हैं इसी वास्ते कि ख़्वाब

अहमद शहरयार

क़तरा ठीक है दरिया होने में नुक़सान बहुत है

अहमद शहरयार

न दस्तकें न सदा कौन दर पे आया है

अहमद शहरयार

लम्स-ए-सदा-ए-साज़ ने ज़ख़्म निहाल कर दिए

अहमद शहरयार

ख़्वाब-ए-ज़ियाँ हैं उम्र का ख़्वाब हैं हासिल-ए-हयात

अहमद शहरयार

जल उठें यादों की क़ंदीलें, सदाएँ डूब जाएँ

अहमद शहरयार

इल्म का दम भरना छोड़ो भी और अमल को भूल भी जाओ

अहमद शहरयार

हमारे शहर की रिवायतों में एक ये भी था

अहमद शहरयार

हद्द-ए-गुमाँ से एक शख़्स दूर कहीं चला गया

अहमद शहरयार

फ़क़ीर-ए-शहर भी रहा हूँ 'शहरयार' भी मगर

अहमद शहरयार

अभी हमें गुज़ारनी है एक उम्र-ए-मुख़्तसर

अहमद शहरयार

ये गुत्थी कब से मैं सुलझा रहा हूँ

अहमद शाहिद ख़ाँ

शम्अ की तरह से जलना सीख औरों के लिए

अहमद शाहिद ख़ाँ

दुनिया ने जो ज़ख़्म दिए थे भर दिए तेरी यादों ने

अहमद शाहिद ख़ाँ

वो जिन दरख़्तों की छाँव में से मुसाफ़िरों को उठा दिया था

अहमद सलमान

सब ने माना मरने वाला दहशत-गर्द और क़ातिल था

अहमद सलमान

मैं हूँ भी तो लगता है कि जैसे मैं नहीं हूँ

अहमद सलमान

कुचल कुचल के न फ़ुटपाथ को चलो इतना

अहमद सलमान

जो दिख रहा उसी के अंदर जो अन-दिखा है वो शायरी है

अहमद सलमान

ज़ख़्म इतने हैं बदन पर कि कहीं दर्द नहीं

अहमद सग़ीर सिद्दीक़ी

ये न देखो कि मिरे ज़ख़्म बहुत कारी हैं

अहमद सग़ीर सिद्दीक़ी

ये क्या कि आशिक़ी में भी फ़िक्र-ए-ज़ियाँ रहे

अहमद सग़ीर सिद्दीक़ी