Couplets Poetry (page 118)

आप के दम से तो दुनिया का भरम है क़ाएम

शाहिद कबीर

ज़लज़ले का था सफ़र जिस में की मस्ती हम ने

शाहिद जमील

तुझे इस गाँव से जाना है इक दिन

शाहिद ग़ाज़ी

तेरी फ़य्याज़ी के थे चर्चे बहुत मैं ने सुने

शाहिद ग़ाज़ी

मुफ़लिसों की बस्ती को बेकसी ने घेरा है

शाहिद ग़ाज़ी

माझी ने डुबोया है लहरों ने उछाला है

शाहिद ग़ाज़ी

इस रंग बदलती दुनिया में पहचान बड़ी ही मुश्किल है

शाहिद ग़ाज़ी

दूर तक फ़ज़ाओं में

शाहिद अज़ीज़

बस्ती में अब कोई नहीं

शाहिद अज़ीज़

दिए हैं ज़िंदगी ने ज़ख़्म ऐसे

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

इक ग़लत-फ़हमी ने दिल का आइना धुँदला दिया

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

चलो यूँ ही सही हम बेवफ़ा हैं

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

यूँ तो मुमकिन नहीं दुश्मन मिरे सर पर पहुँचे

शहबाज़ ख़्वाजा

वो एक तू कि तिरे ग़म में इक जहाँ रोए

शहबाज़ ख़्वाजा

सफ़र का एक नया सिलसिला बनाना है

शहबाज़ ख़्वाजा

मुझे ये ज़िद है कभी चाँद को असीर करूँ

शहबाज़ ख़्वाजा

मता-ए-जाँ हैं मिरी उम्र भर का हासिल हैं

शहबाज़ ख़्वाजा

कितने गुलशन कि सजे थे मिरे इक़रार के नाम

शहबाज़ ख़्वाजा

किसी ने देख लिया था जो साथ चलते हुए

शहबाज़ ख़्वाजा

इक ऐसा वक़्त भी सहरा में आने वाला है

शहबाज़ ख़्वाजा

हालात 'शहाब' आँख उठाने नहीं देते

शहाब सफ़दर

चले तो पाँव के नीचे कुचल गई कोई शय

शहाब जाफ़री

ख़ून ये जाता रगों से फूट कर

शहाब अशरफ़

ये निगल जाएगी इक दिन तिरी चौड़ाई चर्ख़

शाह नसीर

ये दाग़ नहीं तन पर मैं देखने को तेरे

शाह नसीर

ये चर्ख़-ए-नीलगूँ इक ख़ाना-ए-पुर-दूद है यारो

शाह नसीर

ये अब्र है या फ़ील-ए-सियह-मस्त है साक़ी

शाह नसीर

वस्ल की रात हम-नशीं क्यूँकि कटी न पूछ कुछ

शाह नसीर

वक़्त-ए-नमाज़ है उन का क़ामत-गाह-ए-ख़दंग-ओ-गाह-ए-कमाँ

शाह नसीर

तू तो इक परचा भी वाँ से नामा-बर लाया न आह

शाह नसीर