Couplets Poetry (page 117)

अभी तो पहले परों का भी क़र्ज़ है मुझ पर

शाहिद ज़की

अब मुझे बोलना नहीं पड़ता

शाहिद ज़की

वही सफ़्फ़ाक हवाओं का सदफ़ बनते हैं

शाहिद मीर

तुझ को देखा नहीं महसूस किया है मैं ने

शाहिद मीर

रोने से और लुत्फ़ वफ़ाओं का बढ़ गया

शाहिद मीर

पहले तो छीन ली मिरी आँखों की रौशनी

शाहिद मीर

गँवाए बैठे हैं आँखों की रौशनी 'शाहिद'

शाहिद मीर

बुझती हुई सी एक शबीह ज़ेहन में लिए

शाहिद मीर

और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन

शाहिद मीर

रंग बे-रंग हुआ डूब गईं आवाज़ें

शाहिद माहुली

फैला हुआ है जिस्म में तन्हाइयों का ज़हर

शाहिद माहुली

ख़ूँ का सैलाब था जो सर से अभी गुज़रा है

शाहिद माहुली

शरीफ़ लोग कहाँ जाएँ क्या करें आख़िर

शाहिद लतीफ़

रात ही के दामन में चाँद भी हैं तारे भी

शाहिद लतीफ़

कोई लहजा कोई जुमला कोई चेहरा निकल आया

शाहिद लतीफ़

ज़िंदगी इक आँसुओं का जाम था

शाहिद कबीर

वो भी धरती पे उतारी हुई मख़्लूक़ ही है

शाहिद कबीर

तेरा कूचा तिरा दर तेरी गली काफ़ी है

शाहिद कबीर

तबाह कर गई पक्के मकान की ख़्वाहिश

शाहिद कबीर

शहर में गलियों गलियों जिस का चर्चा है

शाहिद कबीर

पाया नहीं वो जो खो रहा हूँ

शाहिद कबीर

मय-ख़ाने की बात न कर वाइज़ मुझ से

शाहिद कबीर

कुछ तो हो रात की सरहद में उतरने की सज़ा

शाहिद कबीर

कौन है अपना कौन पराया क्या सोचें

शाहिद कबीर

काँटों को पिला के ख़ून अपना

शाहिद कबीर

इतनी जल्दी तो बदलते नहीं होंगे चेहरे

शाहिद कबीर

इस सोच में ज़िंदगी बिता दी

शाहिद कबीर

गिरने दो तुम मुझे मिरा साग़र संभाल लो

शाहिद कबीर

ग़म का ख़ज़ाना तेरा भी है मेरा भी

शाहिद कबीर

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है

शाहिद कबीर