Couplets Poetry (page 116)
ऐसे हिज्र के मौसम कब कब आते हैं
शहरयार
अब तो ले दे के यही काम है इन आँखों का
शहरयार
अब रात की दीवार को ढाना है ज़रूरी
शहरयार
अब जिधर देखिए लगता है कि इस दुनिया में
शहरयार
अब जी के बहलने की है एक यही सूरत
शहरयार
आसमाँ कुछ भी नहीं अब तेरे करने के लिए
शहरयार
आँखों में तेरी देख रहा हूँ मैं अपनी शक्ल
शहरयार
आँखों को सब की नींद भी दी ख़्वाब भी दिए
शहरयार
आँख की ये एक हसरत थी कि बस पूरी हुई
शहरयार
आँधियाँ आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ
शहरयार
मिरे अलावा सभी लोग अब ये मानते हैं
शहराम सर्मदी
फ़क़त ज़मान ओ मकाँ में ज़रा सा फ़र्क़ आया
शहराम सर्मदी
ब-नाम-ए-इश्क़ इक एहसान सा अभी तक है
शहराम सर्मदी
हम ज़ब्त की हदों से गुज़र भी नहीं गए
शहनाज़ नूर
ये सूखे पत्ते नहीं ज़माने पे तब्सिरे हैं
शहनवाज़ ज़ैदी
वो मिरे कासे में यादें छोड़ कर यूँ चल दिया
शहनवाज़ ज़ैदी
उस की आँखों में मोहब्बत का गुमाँ तक नहीं आज
शहनवाज़ ज़ैदी
तितलियाँ फूल में क्या ढूँढती रहती हैं सदा
शहनवाज़ ज़ैदी
सहर होते ही जैसे रेत भर जाती है साँसों में
शहनवाज़ ज़ैदी
''जो भी आवे है वो नज़दीक ही बैठे है तिरे''
शहनवाज़ ज़ैदी
चेहरों को पैरों से कुचल कर आगे बढ़ जाना
शहनवाज़ ज़ैदी
आप की आँखों में आँसू देख कर
शाहजहाँ बानो याद
मैं ने उन सब चिड़ियों के पर काट दिए
शाहिदा हसन
यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे
शाहिद ज़की
रौशनी बाँटता हूँ सरहदों के पार भी मैं
शाहिद ज़की
फलों के साथ कहीं घोंसले न गिर जाएँ
शाहिद ज़की
मैं तो ख़ुद बिकने को बाज़ार में आया हुआ हूँ
शाहिद ज़की
मैं बदलते हुए हालात में ढल जाता हूँ
शाहिद ज़की
मैं आप अपनी मौत की तय्यारियों में हूँ
शाहिद ज़की
बिन माँगे मिल रहा हो तो ख़्वाहिश फ़ुज़ूल है
शाहिद ज़की